Type Here to Get Search Results !

चावल चालीस का किलो है | Chawal Chalis Ka Killo Hai Hindi Kahani

 गली में कोई आवाज लगा रहा था. दाल ले लो... चावल ले लो.


.



"ओ भैया ! कैसे दे रहे रहे हो?" तीसरी मजिल से एक महिला ने आवाज लगाई थी. वह आदमी अपनी साइकिल पर तीन कट्टे चावल और हेंडिल पर दो थैलों में दाल लादे हुए था.


.


"चावल चालीस का किलो है और मसूर सत्तर की किलो है."


.


"रुको मैं नीचे आती हूँ." कहकर महिला नीचे आने लगी. वह साइकिल लिए धूप में खड़ा रहा. कुछ देर बाद वह बाहर आई.


.


"अरे! भैया, तुम लोग भी न हमें खूब चूना लगाते हो. चालीस रुपये किलो तो बहुत अच्छा चावल आता है और दाल भी महंगी है... सही-सही भाव लगा लो. "


.


"बहिन जी! इस से कम न दे सकूँगा. आप जानती नहीं हैं कि चावल और दाल को पैदा होने में सौ से एक सौ बीस दिन लगते हैं. एक किलो चावल पर बीस-तीस लीटर पानी लगता है. हर दिन डर लगता है हमें कि कुछ अनहोनी न हो जाय मौसम की. चार महीने पसीना बहाने के बाद भी कई बार फसल के दाम नहीं मिलते. आप लोग किसानों की बात खूब करते हैं पर कोई नहीं जानता कि हर साल दो लाख किसान मर जाते हैं. हमारे पास आप जैसे बड़े मकान नहीं, सुविधा के सामान नहीं. खुद ही निकल पड़े हैं इस लोहे के घोड़े पर लादकर."


.


"सब जानती हूँ भैया पर वहाँ स्टोर में तो सस्ता मिलता है." वह अपनी बात ऊपर करते हुए बोली.


.



"बहिन जी, दो रुपए किलो का आलू चार सौ रुपये किलो में चिप्स में, बीस रुपये किलो का चावल सात-आठ सौ रुपये किलो और हमारी अस्सी रुपये किलो की मिर्च पीसकर डिब्बों ले तीन चार सौ रुपये किलो आपको सस्ती लगती. नहीं दे सकेंगे जी." वह आगे बढ्ने लगा.


.


"लगता है तुम टी वी खूब देखते हो." महिला बोली.


.


"हाँ, कभी-कभी देखते हैं अपना मज़ाक बनते हुए. खेती की जमीन पर कब्जे, पानी का नीचे जाता स्तर, खाद, बीज के बढ़ते भाव और किसानों की बेइज्जती तो आप भी जानती होंगी. यहाँ कोई बड़ा आदमी करोड़ों लेकर भाग जाय तो कुछ नहीं, हम कर्ज न चुका पाएँ तो बैंक दीवार पर नाम का नोटिस चस्पा कर देता है. सब के सामने बेइज्जत करता है , कुर्की लाता है. बहिन चाँदी तो बिचौलिये काट रहे हैं."


.


"लगता है राजनीति भी जानते हो तुम."


.


"हम तो शिकार हैं राजनीति के. जब इस देश की नदियां सूख जाएगी, जंगल खत्म हो जाएँगे, जब खेतों पर इमारतें होंगी तब इंसान लड़ेगा रोटी के हर टुकड़े के लिए मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी... फिर ये फेक्टरियां भूख मारने की दवाई बनाएँगी या एक-दूसरे को मारने की गोलियां." वह बोला.


.


"बात तो पढे-लिखों जैसी कर रहे हो भैया. कहाँ तक पढे हो ?"


.


"सरकारी कालेज से बी ए किया है, पर हमारे लिए नौकरी नहीं है. हम अपनी भाषा में जो पढे हैं. यहाँ तो सबको चटर -पटर अंग्रेजी चाहिए और ससुर गाली देंगे अपनी भाषा में. अनपढ़ करेंगे राज तो होगी ही मेहनतकश पर गाज." वह अपना पसीना पोंछते हुए बोला.


.


"वोट तो तुम भी देते हो न."


.


"वोट भी हम देते हैं, जान भी हम देते हैं, भीड़ भी हम होते हैं और मरने को सेना में भी हम जाते हैं. आम आदमी बस साल में एक दिन नारा लगाता है जय जवान जय किसान और हो गए महान." वह बोला. धूप बहुत तेज थी सो सीधे सवाल किया "बहिन जी! कितना लेना है?"


.


"पाँच किलो चावल और दो किलो दाल." महिला दाल देखते हुए बोली.


.


"ठीक है दस रुपया कम दे देना कुल पैसे में." और उसने साइकिल स्टेंड पर खड़ी कर दी. महिला उसका लाल तमतमाया हुआ चेहरा देखती रही. वह सामान तौलने में लग गया.


.


"लो बहिन जी, आपका सामान तौल दिया.


.


महिला ने सामान लिया और बोली , "ऊपर जाकर पैसे देती हूँ भैया."


.


कुछ देर बाद एक टोकरी उसने लटका दी जिसमें उसके पूरे पैसे थे. एक पानी की बोतल थी और कुछ लपेटकर रखा हुआ था.


.


उसने पैसे और पानी ले लिया.


.


"बहिन आपने ज्यादा पैसे रख दिये हैं. दस रुपये काटे नहीं." वह चिल्लाया.


.


"पहले खाना ले लो... समझना मैंने रुपये ले लिए.... तुमने बहिन कहा है मुझे, खाना जरूर खाना." उसने वहीं बैठकर खाना शुरू कर दिया था.


.


तीसरे मंजिल से कुछ टपका था मगर तपती धूप में दिखा नहीं था. हथेलियों पर राहत की दो गरम बूंद आत्मीयता के मोतियों के बिखर गए थे. टोकरी धीरे-धीरे कर ऊपर चली गई थी और उसके हाथ ऊपर उठ गए थे प्रार्थना में एक अनजान बहन के लिए

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.