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मां-बाप बनने का मतलब सिर्फ जन्म देना नहीं होता। Hindi kahani

एक मासूम बेटी

सुबह के सवा सात बजे थे। आठवीं कक्षा की छात्रा रिया स्कूल के लिए तैयार हो रही थी, पर उसके कदम आज भी वही पुरानी आदत दोहरा रहे थे — दबे पांव ऊपर मम्मी के कमरे की तरफ जाना, दरवाज़ा हल्का सा सरकाकर अंदर झांकना। कमरा हमेशा की तरह बिखरा हुआ था। नीचे उतरी तो पापा सोफे पर वैसे ही औंधे पड़े सो रहे थे, जैसे रात भर की थकान नहीं बल्कि रात भर की लड़ाई का बोझ लिए हों।

मां-बाप की लड़ाई में टूट गई एक मासूम बेटी की जिंदगी — दिल दहला देने वाली सच्ची कहानी


अपने कमरे में लौटकर उसने गुल्लक से चुपचाप पचास रुपये निकाले और बैग की जेब में रख लिए — यह उसकी अपनी छोटी सी दुनिया थी, जहां कोई झगड़ा नहीं पहुंचता था। बैग कंधे पर टांगकर जैसे ही वह दरवाज़े तक पहुंची, रसोई से कमला काकी की आवाज़ आई, "रिया बेटा, आलू का पराठा बनाया है, खा तो लो।"

रिया ने बुझी हुई आंखों से बस इतना कहा, "काकी, भूख नहीं है।" कमला काकी ने फिर भी ज़बरदस्ती टिफिन उसके बैग में ठूंस दिया और उसे स्कूल भेज दिया। उसके जाते ही काकी सोचने लगीं — यह मासूम बच्ची तेरह साल की उम्र में इतनी बड़ी कैसे हो गई, जबकि होना तो चाहिए था इसका बचपना।

कमला काकी पिछले दस बरसों से रिया के माता-पिता, अनुज और स्वाति के घर काम कर रही थीं। दोनों बड़ी कंपनियों में ऊंचे पदों पर थे, पैसों की कोई कमी नहीं थी। रिया इकलौती संतान थी — हर सुख-सुविधा उसके कदमों में थी, सिवाय एक चीज़ के: शांति। अनुज पिछले कई महीनों से तलाक की मांग कर रहा था, और चाहता था कि रिया की परवरिश स्वाति संभाले। स्वाति भी रिया को अपने पास रखना चाहती थी, लेकिन साथ ही जायदाद में हिस्सेदारी भी मांग रही थी। दोनों की लड़ाई का केंद्र कहीं न कहीं रिया की "ज़िम्मेदारी" ही बन चुकी थी — मगर असल में कोई भी उसे प्यार से अपनाना नहीं चाहता था, सिर्फ हक जताना चाहता था।

रोज़ की तरह उस दिन भी अनुज और स्वाति ने अलग-अलग कमरों में नाश्ता किया और अपने-अपने ऑफिस निकल गए। दोपहर करीब बारह बजे स्कूल से फोन आया — "जल्दी अस्पताल पहुंचिए, रिया को गंभीर चोट लगी है।" दोनों जब अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि रिया सीढ़ियों से गिर गई थी। उसे आईसीयू में भर्ती किया गया, सिर में गहरी चोट थी, ऑपरेशन शुरू हुआ — मगर इस बार जिंदगी हार गई।

अनुज और स्वाति सुन्न रह गए। दोनों को इतना बड़ा झटका लगा था कि जैसे उनकी दुनिया ही थम गई हो। रिया की दादी भी पहुंच गई थीं, बेटे-बहू को देखते ही उन्होंने नफरत भरी नज़रों से मुंह फेर लिया। पूछताछ हुई, टीचरों और सहपाठियों के बयान लिए गए — निष्कर्ष यही निकला कि संतुलन बिगड़ने से वह गिर गई थी।

तेरहवीं के बाद जब अनुज ने अपनी मां को रोकने की कोशिश की, तो उनकी आंखों में आंसू भरकर बस इतना निकला, "तुम दोनों हत्यारे हो। तुम्हारी ज़िद ने मेरी पोती को खा लिया। मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहती थी, पर तुमने उसे अपने अहंकार का मोहरा बना दिया।" इतना कहकर वे चली गईं।

कमला काकी उस दिन के बाद से सदमे में थीं। जैसे-तैसे खुद को संभालते हुए उन्होंने साहब-मेमसाब से कहा, "अब मैं यहां नहीं रह पाऊंगी। इस घर की दीवारों में मेरी रिया की सिसकियां बसी हैं। मैंने उसे कभी अपनी गोद में तो कभी छिपकर रोते हुए देखा है। मन तो करता था उसे लेकर कहीं दूर भाग जाऊं, पर हिम्मत नहीं जुटा पाई। शायद अगर चली जाती, तो आज वो जिंदा होती।"

दिन बीतते गए। अनुज और स्वाति के बीच की तकरार अब एक अजीब सी खामोशी में बदल चुकी थी — जैसे शब्द भी उनका साथ छोड़ गए हों। एक इतवार की सुबह, बड़ी हिम्मत जुटाकर स्वाति रिया के कमरे में गई। महीनों से किसी ने भी उस कमरे में कदम नहीं रखा था। बिस्तर, तकिया, किताबें, पेंसिल-पेन, स्कूल बैग — सब कुछ वैसे ही पड़ा था, जैसे रिया अभी लौटकर आएगी।

अलमारी खोली तो कपड़े नीचे गिर पड़े — उसका पसंदीदा हल्का नीला नाइट सूट भी उसी में था। स्वाति सिसकते हुए सामान समेटने लगी, तभी उसके हाथ एक नीले रंग की डायरी लगी। कांपते हाथों से उसने पन्ने पलटे — शुरुआती कुछ पन्ने फटे हुए थे, बाकी पर एक टूटे हुए दिल की कहानी छोटे-छोटे शब्दों में दर्ज थी।

"मम्मी-पापा, मैं आपको 'डियर' नहीं लिखूंगी, क्योंकि डियर का मतलब प्यारा होता है। पापा, आप मम्मी से कहते हो 'तुम्हारी बेटी', और मम्मी, आप पापा से कहती हो 'तुम्हारी बेटी'। आप दोनों कभी 'हमारी बेटी' क्यों नहीं कहते?"

अगले पन्ने पर लिखा था — "जब मैं मामा के घर जाती हूं, तो मामी प्यार से अनु को 'मेरा बच्चा' कहती हैं। तब लगता है, मैं किसी की प्यारी बच्ची नहीं हूं। मम्मा, मैं आपकी हर बात मानती हूं, फिर भी आपने कभी मुझे 'मेरा बच्चा' नहीं कहा।"

एक और पन्ने पर — "मम्मा, बुआ के घर जाती हूं तो वो भी प्यार करती हैं, पर खाना हमेशा भाई की पसंद का बनता है। मुझे राजमा बहुत पसंद है, मैंने कहा भी था, पर आपने कहा 'परेशान मत करो, काकी से बनवा लो'। अब राजमा अच्छा नहीं लगता, मैंने खाना ही छोड़ दिया।"

"पापा, आपके चिल्लाने से बहुत डर लगता है। मैं आपके साथ आइसक्रीम खाने जाना चाहती हूं, पर आप कहते हो 'फालतू चीज़ों के लिए टाइम नहीं है'। जब मौसी-मौसा मुझे और भाई को आइसक्रीम खिलाने ले जाते हैं, तो वो कभी ऐसा नहीं कहते। मम्मी, मैं अपने घर से दूर जाना चाहती हूं, जहां मुझे यह न सुनना पड़े कि 'मैं रिया को नहीं रखूंगी'। पापा, अगर मैं बड़ी होती तो आप दोनों को कभी परेशान न करती, खुद ही चली जाती। मैं आप दोनों से बहुत प्यार करती हूं, फिर आप मुझसे प्यार क्यों नहीं करते?"

"आई लव यू काकी, मुझे प्यार करने के लिए, डर लगने पर पास सुलाने के लिए, मेरी हर बात सुनने के लिए।"

आखिरी पन्ने पर सिर्फ इतना लिखा था — "दादी, आई लव यू, आप मुझे यहां से ले जाओ, प्रॉमिस है, कभी तंग नहीं करूंगी।"

स्वाति डायरी सीने से लगाकर फूट-फूटकर रो पड़ी। रोने की आवाज़ सुनकर अनुज भी दौड़ा आया। स्वाति ने कांपते हाथों से डायरी उसे थमा दी। पन्ने पलटते हुए अनुज का चेहरा बदलता गया, और आखिर में वह खुद को संभाल न सका, वहीं ज़मीन पर बैठ गया। स्वाति रोते हुए बोली, "अनुज, वो हादसा नहीं था... वो आत्महत्या थी। जिस रिश्ते को हम बोझ समझते रहे, हमारी रिया ने खुद को उससे आज़ाद कर लिया। हमने अपने ही हाथों अपनी बच्ची की जान ले ली।" अनुज सिर पकड़कर फूट-फूटकर रो पड़ा।

यह कहानी सिर्फ रिया की नहीं — हर उस घर की है, जहां मां-बाप बच्चों के सामने लड़ते हैं, जहां रिश्ते टूटते हैं और घर बिखर जाते हैं। इन टूटते रिश्तों की सबसे भारी कीमत हमेशा बच्चे चुकाते हैं। जो माता-पिता अच्छी परवरिश नहीं दे सकते, उन्हें बच्चे को जन्म देने का हक ही नहीं है — क्योंकि अच्छी परवरिश का मतलब पैसा या सुविधा नहीं, बल्कि यह है कि जब बच्चे को ज़रूरत हो, आप उसके कितने करीब खड़े हों।

सीख की बात:

बच्चे सब कुछ समझते हैं, बस बोलते नहीं — वे अपने दर्द को डायरी में लिखते हैं, दिल में नहीं जताते। जब रिश्तों में कड़वाहट भर जाती है, तो सबसे पहले मासूमियत ही मरती है। प्यार करना काफी नहीं, प्यार जताना भी ज़रूरी है — क्योंकि बच्चों को सिर्फ यह महसूस कराना होता है कि वे किसी के "अपने" हैं। मां-बाप बनने का मतलब सिर्फ जन्म देना नहीं होता — साथ निभाना और भावनात्मक रूप से मौजूद रहना ही असली परवरिश है। अगर आप अपने रिश्तों को संभाल नहीं सकते, तो कम से कम इतना याद रखिए — जब रिश्ता टूटता है, तो सिर्फ दो लोग नहीं टूटते, एक मासूम आत्मा हमेशा के लिए बिखर जाती है।

अगर आपको अपने बच्चे की मुस्कान प्यारी है, तो आज ही अपने रिश्तों पर काम करना शुरू कीजिए — वरना एक दिन वही मुस्कान सिर्फ एक याद बनकर रह जाएगी।

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