*हर थप्पड़ की अपनी कीमत होती है*
रमन बार-बार दरवाजे की तरफ देख रहा था। दो-तीन बार तो बाहर होकर भी आ गया, लेकिन अभी तक मंजरी का कोई पता नहीं था। दो-तीन बार फोन उठाकर फोन भी ट्राई कर लिए, पर मंजरी ने फोन तक नहीं उठाया। एक दो बार बड़ी उम्मीद के साथ रसोई में काम करती हुई अपनी पत्नी साक्षी की तरफ भी देखा, पर साक्षी ने ध्यान तक नहीं दिया। गुस्सा भी बहुत आ रहा था उस पर, पर कुछ कह नहीं सकता था। क्योंकि साक्षी जवाब देना सीख चुकी थी।
अचानक अंदर कमरे में से मां माधवी जी के करहाने की आवाज आई तो अंदर कमरे में आकर देखा। मां उदास से बिस्तर पर पड़ी हुई थी। आंखों में से कुछ बूंदे आंसू की गिर चुकी थी। बड़ी उदासी के साथ उन्होंने रमन की तरफ देखा। फिर उन्होंने दूसरी तरफ मुंह कर लिया। देखकर रमन सिर्फ इतना ही बोला,
" बस, मां मंजरी अभी थोड़ी देर में आती ही होगी। आप परेशान ना हो"
आखिर वापस मोबाइल उठाकर मंजरी को फोन करने लगा। इतने में मोबाइल की रिंग दरवाजे पर ही महसूस हुई। बाहर जाकर देखा तो मंजरी आ चुकी थी। उसे देखते ही रमन बोला,
" मंजरी तुम आज भी लेट आई हो। मां कब से तुम्हारा इंतजार कर रही है"
" भैया जी क्या बताएं। कितनी ही कोशिश कर लो पर ट्रैफिक के कारण लेट हो ही जाती हूं"
" अच्छा अच्छा ठीक है। जाओ पहले मां के पास जाओ"
मंजरी अंदर कमरे में गई और दरवाजा हल्का सा लगा दिया। इधर रमन अभी भी गुस्से से अपनी पत्नी साक्षी को घूर रहा था। पर साक्षी निरंतर वैसे ही काम किए जा रही थी जैसे कुछ हुआ ही ना हो। रमन लड़ने के मूड से रसोई में आया। इससे पहले कि वो कुछ कहता साक्षी ने अपना टिफिन पैक किया और रसोई से निकलकर अपना बैग उठाया और अपने स्कूल के लिए रवाना हो गई।
रमन को गुस्सा तो बहुत आ रहा था पर क्या कर सकता था? आखिरकार उसने मंजरी के लिए चाय चढ़ाई और चाय का कप बाहर हॉल में रखकर मंजरी को आवाज दे दी,
" मंजूरी अपनी चाय ले जाओ"
इतने में मंजरी निकल कर बाहर आई और चाय उठाने लगी तो रमन ने पूछा,
" मां ठीक है"उसके सवाल को सुनकर मंजरी ने रमन की तरफ देखा और कहा,
" हां भैया जी माँ जी ठीक है"
" सुबह से कई बार पूछ चुका हूं पर वो कुछ जवाब ही नहीं दे रही थी"
अभी भी रमन ने सवाल किया तो मंजरी ने जवाब दिया,
" वो दरअसल भैया जी उनके कपड़े गंदे हो गए थे इसलिए परेशान हो रही थी। शायद इसीलिए वह आपको जवाब नहीं दे रही थी"
"ओह! तुमने कल जाने से पहले माँ को डायपर नहीं लगाया था"
" लगाया था भैया जी पर कपड़े तो गंदे हो ही जाते हैं। बस मैंने उन्हें नहला दिया है। चाय पी कर उन्हें कुछ खिला पिला देती हूं। उन्होंने सुबह से शायद कुछ नहीं खाया और ना ही कुछ पिया है। टेबल पर सब सामान ऐसे ही रखा है"
सुनकर रमन को अपनी पत्नी साक्षी पर बहुत गुस्सा आ रहा था। रमन मंजरी के सामने ही बोला,
" कैसी पत्नी है मेरी? कैसी औरत है? जिसे मां की तकलीफ तक नहीं दिखती। अगर मेरी मां की जगह उसकी मां होती बिस्तर पर, तब भी ऐसा ही करती? कभी मां के कमरे में जाकर झाँकती तक नहीं। मां सुबह से परेशान हैं। शर्म के मारे अपने बेटे को नहीं कह पा रही तो कम से कम बहू होने के नाते वही पूछ लेती। लेकिन नहीं, पता नहीं मन में क्या लेकर बैठी है"
" सचमुच भैया जी आपको पता नहीं कि भाभी जी मन में क्या लेकर बैठी है?"
मंजरी के सवाल से रमन हतप्रभ रह गया। बस इतना ही कहा,
" तुम मां का ख्याल रखो"
रमन वहीं बैठ गया और मंजरी अपनी चाय लेकर अंदर माधवी जी के पास चली गई। बैठे-बैठे ही अतीत के गलियारों में घूमने लगा। जब साक्षी उसकी दुल्हन बन इस घर में आई थी। घर में मां माधवी जी, ननद वैष्णवी और रमन ही थे। साक्षी के आने के बाद सिर्फ चार लोगों का छोटा सा परिवार। पर पता नहीं क्यों माधवी जी साक्षी से सीधे मुंह बात तक नहीं करती थी। वो हमेशा अपनी सास वाली टेक में ही रहती। उन्हें लगता कि कहीं उनके इकलौते बेटे को साक्षी छीन ना ले। बस इसी कारण हर चीज में मीन मेख निकालना, उसमें दस कमियां बताना, उनकी आदत थी। और इस चीज का फायदा सबसे ज्यादा वैष्णवी उठाती थी। उसे बड़ा मजा आता था अपनी मां को भाभी के खिलाफ भड़काने में।
रमन अपनी मां के नजदीक ज्यादा था इसलिए वो भी अपनी मां पर ही ज्यादा विश्वास करता था। इसलिए वो भी साक्षी को दो बातें सुना देता। एक दिन वैष्णवी को कॉलेज अपनी नीली यूनिफॉर्म में जाना था। पर वैष्णवी अपनी यूनिफॉर्म निकालकर साक्षी को देना भूल गई। यूनिफार्म गंदा ही रह गया। दूसरे दिन जब वो तैयार होने के लिए तैयार होने लगी तो यूनिफार्म गंदा देखकर उसने चिल्लाना शुरू कर दिया।
माधवी जी ने देखा तो वैष्णवी की गलती ना देखकर उन्होंने साक्षी को चिल्लाना शुरु कर दिया। तो साक्षी ने भी कह दिया,
" माँजी मेरी गलती क्या है? वैष्णवी ने मुझे ड्रेस दिया ही नहीं तो मैं धोती कैसे?"
बस इसी बात को माधवी जी ने पकड़ लिया और रमन के सामने रोना धोना शुरू कर दिया,
" यही सम्मान रह गया तेरी पत्नी की नजर में मेरा। आज मुझे बातें सुना रही है, कल को घर से निकाल देगी। यही सिला मिलेगा मुझे तेरी परवरिश का"
रमन में भी आव देखा ना ताव, सीधा एक थप्पड़ साक्षी के गाल पर जड़ दिया। साक्षी आंखों में आंसू भर कर अपने गाल सहलाती रह गई। और दोनों मां बेटी अपनी कुटिल मुस्कान के साथ अपने कमरे में चली गई। साक्षी अंदर तक टूट चुकी थी। छोड़कर सब कुछ जाना चाहती थी पर जा नहीं पाई क्योंकि माता-पिता ने ये कहकर साथ ही नहीं दिया कि ये सब तो घर गृहस्थी में लगा ही रहता है।
माधवी जी को जब से ये पता चला कि इसके माता-पिता इसका साथ नहीं देने वाले तो उनके तानों की बौछार और भी तेज हो चुकी थी। वक्त यूं ही बीत रहा था।
साक्षी मां बनने वाली थी। सातवाँ महीना चल रहा था। उस दिन बहुत बारिश हो रही थी। रमन, माधवी जी और वैष्णवी सभी घर में थे। माधवी जी ने साक्षी को कॉफी बनाकर लाने को कहा। साक्षी कॉफी बना कर ला ही रही थी कि अपने कमरे में से तेजी से निकलते हुए वैष्णवी साक्षी से टकरा गई और कॉफी का कप नीचे गिर गया।
हालांकि की वैष्णवी को कोई चोट नहीं लगी लेकिन उसके बावजूद उसने चिल्लाना शुरू कर दिया,
" हाय मुझे जला दिया, हाय मुझे जला दिया"
सुनकर माधवी जी और अमन अपने कमरे में से दौड़े चले आए। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता माधवी जी ने एक जोरदार थप्पड़ साक्षी के गाल पर दे मारा। थप्पड़ इतनी तेजी से मारा था कि साक्षी अपने आपको बैलेंस नहीं कर पाई और वहां रखे डाइनिंग टेबल से पेट के बल जा टकराई।
टेबल से टकराने के कारण उसके पेट पर जोर चोट लगी और दर्द के मारे झटपटाने लगी। रमन तो कुछ कह भी नहीं पाया। पर साक्षी को छटपटाते देखकर रमन साक्षी को लेकर हॉस्पिटल लेकर रवाना हुआ। वहां पहुंचा तो पता चला साक्षी का मिसकैरेज हो गया।
सप्ताह भर हॉस्पिटल में रहने के बाद साक्षी को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई। पर अभी भी डॉक्टर ने उसे बेड रेस्ट के लिए कहा था। माधवी जी ने साफ कह दिया था कि हम इसकी देखभाल नहीं करेंगे इसे इसके मां-बाप के घर छोड़ आ। पर रमन ऐसा नहीं करना चाहता था क्योंकि अगर वो उसे उसके मायके छोड़ कर आता तो लोगों को पता चल जाता है कि साक्षी के साथ आखिर हुआ क्या था? और वो नहीं चाहता था कि लोगों को बाहर ये पता चले कि साक्षी की हालत के जिम्मेदार वो लोग है।
इसलिए रमन ने उसके लिए एक नर्स बुलाई थी। तब मंजरी पहली बार इस घर में आई थी। मंजरी को बीस दिन के लिए साक्षी की देखभाल के लिए रखा था। रमन ने मंजरी को रखकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली थी। अब मंजरी ही साक्षी को संभालती थी।
पर इन दस दिनों में मंजरी माधवी जी और वैष्णवी के स्वभाव को अच्छे से देख चुकी थी। रमन तो ऑफिस के काम से बिजी रहता। यहां दोनों मां बेटी खुद ही बना कर खा पी लेती लेकिन साक्षी के लिए खाना बनाना उनके लिए दूभर होता था। मंजरी जब तक घर पर नहीं आती तब तक साक्षी भूखी प्यासी बैठी रहती लेकिन कोई पानी पूछने वाला नहीं था। मंजरी की गैरमौजूदगी में साक्षी को अगर वॉशरूम भी जाना होता तो दीवार के सहारे जैसे तैसे सहारा लेकर धीरे-धीरे वॉशरूम जाती। पर उसकी परेशानी किसी को नजर ना आती।
खैर धीरे-धीरे साक्षी ठीक हो गई। पर सबसे पहले उसने स्कूल में नौकरी ज्वाइन कर ली। रमन, वैष्णवी और माधवी जी ने मना किया। कुछ दिनों तक उससे बात भी नहीं की, पर साक्षी ने इस बार दिल पक्का कर लिया। अब वो किसी से कुछ बोलती भी नहीं थी। सिर्फ अपने काम से मतलब रखती थी। वक्त के साथ वैष्णवी की भी शादी हो गई और वो अपने ससुराल चली गई। आज उन बातों को चार साल हो चुके हैं। साक्षी दोबारा कंसीव ही नहीं कर पाई तो माधवी जी रमन की दूसरी शादी करने पर उतारू हो गई।
पर साक्षी कुछ नहीं कहती थी और ना ही तलाक लेने को तैयार थी। माधवी जी उसे परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। किसी तरह तो साक्षी घर से निकले। पर ऐसा नहीं हो पा रहा था। इसलिए एक दिन माधवी जी गुस्से ही गुस्से में अपनी बहन के घर रवाना हुई तो रास्ते में एक्सीडेंट हो गया और आज वो बिस्तर पर पड़ी है।
लोगों की तरह दोनों बहन भाई को उम्मीद थी कि साक्षी बहू का फर्ज निभाएगी और अपनी सास की सेवा में दिन रात एक कर देगी। पर साक्षी ने साफ मना कर दिया,
" मुझसे आपकी मां की देखभाल नहीं होगी। या तो नर्स रख लीजिए या फिर इनकी बेटी को बुला लीजिए। क्योंकि हर थप्पड़ अपनी कीमत चुकाता है। और मैं कोई देवी नहीं जो इतना कुछ होने के बावजूद भी इनकी सेवा करूं"
जिस तरह से साक्षी ने घृणा की दृष्टि से माधवी जी को देखा था, रमन और वैष्णवी ही नहीं, माधवी जी की भी नजरें झुक चुकी थी।
वैष्णवी ने ससुराल से यहां आकर रहने के लिए साफ मना कर दिया। इसलिए एक बार फिर मंजरी को बुलाया गया था। ये अलग बात है कि साक्षी घर से जाने से पहले रमन और माधवी जी का खाना भी तैयार करके जाती थी। काम सारे करती थी। बस सेवा नहीं करती थी। और आज किसी में हिम्मत नहीं थी कि वो साक्षी से ये कह दे कि तुम मां की सेवा तो कर लो।
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"हर कहानी सिर्फ शब्दों का मेल नहीं होती, बल्कि कई गहरी अनुभव और आत्मिक सीख से भरी होती है। 👇🏻👇🏻
1. *हर अन्याय का मूल्य होता है* –
जब आप किसी के साथ अन्याय करते हैं, तो समय आने पर उसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है। जैसे साक्षी के साथ हुए अत्याचारों का सामना अंत में माधवी जी को करना पड़ा।
2. *चुप रहना भी एक जवाब होता है* –
साक्षी ने बदले की भावना से नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान के लिए मौन का रास्ता चुना और धीरे-धीरे अपने तरीके से अपने सम्मान को वापस पाया।
3. *सेवा अधिकार नहीं, संस्कार से होती है* –
जब रिश्तों में प्रेम और आदर न हो, तो सेवा सिर्फ मजबूरी बन जाती है। साक्षी ने साफ किया कि बिना दिल से जुड़े हुए सेवा संभव नहीं।
4. *स्त्रियों का आत्म-सम्मान सर्वोपरि है* –
साक्षी ने दुख सहा, अकेले लड़ा, पर अपना आत्मसम्मान नहीं छोड़ा। ये हर महिला के लिए एक प्रेरणा है कि अपनी पहचान और गरिमा बनाए रखना जरूरी है।
5. *संवेदनहीनता रिश्तों को खोखला बना देती है* –
रमन और उसकी माँ की संवेदनहीनता ने एक मजबूत और प्यार भरे परिवार को दर्द और दूरी में बदल दिया।
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*निष्कर्ष:*
*थप्पड़ सिर्फ शारीरिक नहीं होते, वे आत्मा पर भी वार करते हैं। और जब आत्मा तक कोई चोट पहुँचती है, तो उसका उत्तर साक्षी की तरह मौन, आत्मनिर्भरता और सम्मान से दिया जाता है।*
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