“माँ ने बेटे से सिर्फ इतना कहा—‘कल सुबह मैं इस घर से चली जाऊँगी।’
बेटे ने पूछा—‘कहाँ जाओगी?’
माँ ने मुस्कुराकर कहा—‘जहाँ मेरा इंतज़ार कोई करता हो।’”
विवेक ने उस समय अपनी माँ की बात को गंभीरता से नहीं लिया।
वह लैपटॉप पर ऑफिस की मीटिंग में व्यस्त था। उसकी पत्नी रचना रसोई में थी और पंद्रह साल की बेटी काव्या अपने कमरे में ऑनलाइन क्लास कर रही थी।
घर में सब कुछ था—तीन बेडरूम, बड़ा टीवी, महंगा फ्रिज, कार, नौकरानी, हर कमरे में वाई-फाई और हर हाथ में मोबाइल।
बस एक चीज कम थी—
एक-दूसरे के लिए वक्त।
विवेक की माँ सरोज देवी पिछले चार साल से उसी घर में रह रही थीं।
वह ज्यादा कुछ नहीं मांगती थीं। सुबह चाय, दोपहर में थोड़ी बातचीत और शाम को कोई दस मिनट उनके पास बैठ जाए।
बस।
लेकिन धीरे-धीरे उन्हें लगने लगा था कि वह इस घर में रह नहीं रहीं...
बस मौजूद हैं।
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उस शाम सरोज देवी ने रसोई में जाकर रचना से पूछा—
“बहू, आज रात सब साथ खाना खाएंगे?”
रचना ने बिना पीछे देखे कहा—
“माँजी, आप खा लेना। विवेक की मीटिंग देर तक चलेगी।”
“काव्या?”
“उसका प्रोजेक्ट है।”
सरोज देवी ने धीमे से पूछा—
“और तुम?”
रचना कुछ क्षण चुप रही।
“मुझे भी काम है।”
सरोज देवी मुस्कुराईं।
“अच्छा।”
वह अपने कमरे में चली गईं।
कमरे में पहुंचकर उन्होंने अलमारी खोली।
सबसे नीचे से एक पुराना कपड़े का थैला निकाला।
उसमें कुछ साड़ियां थीं, एक पुराना चश्मा, कुछ दवाइयां और एक छोटी-सी गुल्लक।
उन्होंने गुल्लक हाथ में ली और धीरे से कहा—
“अब शायद इसकी जरूरत पड़ जाएगी।”
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अगली सुबह विवेक ऑफिस जाने के लिए निकला तो माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।
उन्होंने कहा—
“बेटा।”
“हां माँ?”
“आज जल्दी घर आना।”
विवेक ने घड़ी देखते हुए कहा—
“क्यों?”
“बस... तुम्हारे साथ बैठकर खाना है।”
विवेक ने मुस्कुराकर कहा—
“ठीक है।”
लेकिन उस दिन भी वह रात साढ़े दस बजे घर पहुंचा।
माँ सो चुकी थीं।
अगले दिन भी यही हुआ।
फिर अगले दिन।
फिर अगले दिन।
एक रविवार को विवेक ने माँ के कमरे में जाकर देखा तो बिस्तर बिल्कुल साफ था।
अलमारी आधी खाली थी।
उसकी माँ का सामान गायब था।
वह घबरा गया।
“माँ!”
कोई जवाब नहीं आया।
रचना दौड़कर आई। काव्या भी पीछे आ गई।
तभी मेज पर एक कागज मिला।
उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“मुझे ढूंढना मत, बेटा।
मैंने तुम्हें बहुत साल ढूंढा है।”
विवेक के हाथ से कागज गिर गया।
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उसे पहली बार एहसास हुआ कि माँ सचमुच चली गई हैं।
वह तुरंत फोन करने लगा।
फोन बंद था।
उसने रिश्तेदारों को फोन किया। किसी को पता नहीं था।
पड़ोस में पूछा। कोई कुछ नहीं जानता था।
तभी काव्या ने धीरे से कहा—
“पापा... दादी कल मेरे कमरे में आई थीं।”
विवेक ने पूछा—
“क्या कहा था?”
“उन्होंने पूछा था कि मैं उन्हें याद रखूंगी?”
विवेक जैसे पत्थर का हो गया।
“तुमने क्या कहा?”
काव्या की आंखें भर आईं।
“मैंने कहा था—दादी, आप कहीं जा रही हो क्या?”
“उन्होंने क्या कहा?”
काव्या रोने लगी।
“उन्होंने कहा था...”
“जिस घर में कोई किसी को सुनता नहीं, वहां जाने की जरूरत नहीं होती... वहां से लोग खुद चले जाते हैं।”
विवेक कुर्सी पर बैठ गया।
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उसने माँ का पुराना फोन ढूंढा।
फोन में कोई खास चीज नहीं थी।
कुछ पुराने नंबर और कुछ तस्वीरें।
लेकिन एक रिकॉर्डिंग मिली।
विवेक ने उसे चलाया।
माँ की आवाज सुनाई दी—
“आज विवेक बहुत व्यस्त था।”
कुछ सेकंड की खामोशी।
“आज मैंने उससे पूछा कि खाना खाया या नहीं... उसने कहा, माँ बाद में बात करता हूं।”
फिर अगली रिकॉर्डिंग—
“आज काव्या मेरे पास बैठी थी। बहुत प्यारी बच्ची है। लेकिन उसकी क्लास शुरू हो गई तो वह चली गई।”
फिर—
“आज बहू ने मेरे लिए चाय बनाई। अच्छी थी।”
विवेक की आंखें नम हो गईं।
अगली रिकॉर्डिंग में माँ की आवाज कांप रही थी।
“मुझे किसी से शिकायत नहीं है।
बस कभी-कभी लगता है कि इस घर में मेरी जरूरत सिर्फ तब पड़ती है जब किसी को दवा चाहिए होती है, खाना चाहिए होता है या बच्चे को देखना होता है।”
विवेक ने फोन बंद कर दिया।
उसका चेहरा दोनों हाथों में छिप गया।
रचना भी रो रही थी।
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लेकिन असली झटका अभी बाकी था।
विवेक ने माँ के कमरे की अलमारी फिर से खोली।
वहां उसे एक फाइल मिली।
उस फाइल में बैंक के कागज थे, घर के कागज थे और एक पुराना अस्पताल का बिल।
विवेक ने बिल देखा तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
वह उसी अस्पताल का बिल था जहां उसके पिता का इलाज हुआ था।
रचना ने पूछा—
“क्या हुआ?”
विवेक बोला—
“पापा के इलाज के लिए पैसे कहां से आए थे, मुझे कभी पता नहीं चला।”
फाइल के अंदर एक बैंक की रसीद थी।
उस पर सरोज देवी के गहने बेचने का विवरण था।
रचना स्तब्ध रह गई।
विवेक ने अगला कागज खोला।
उसमें लिखा था—
“विवेक को मत बताना कि पैसे कहां से आए।
बेटे को अपने पिता के इलाज की चिंता करनी चाहिए, मां के गहनों की नहीं।”
विवेक की आंखों से आंसू बह निकले।
उसने सिर पकड़ लिया।
जिस माँ को वह समझता रहा कि वह उसके घर पर निर्भर हैं...
असल में उसी माँ ने कभी उसे अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए अपना सब कुछ दे दिया था।
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तीन दिन तक विवेक माँ को ढूंढता रहा।
चौथे दिन उसे एक पुराने बस अड्डे से फोन आया।
“क्या आप विवेक बोल रहे हैं?”
“जी।”
“आपकी माँ यहां हैं।”
विवेक बिना कुछ पूछे वहां पहुंच गया।
सरोज देवी बस की बेंच पर बैठी थीं।
सामने एक छोटा बैग रखा था।
विवेक उन्हें देखते ही दौड़ा।
“माँ!”
सरोज देवी ने बेटे को देखा।
विवेक उनके पैरों के पास बैठ गया।
“मुझे माफ कर दो।”
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“किस बात की?”
“आपको अकेला छोड़ने की।”
“तूने मुझे अकेला नहीं छोड़ा बेटा...”
वह मुस्कुराईं।
“तू बस इतना व्यस्त हो गया कि भूल गया मैं भी तेरी जिंदगी का हिस्सा हूं।”
विवेक फूट-फूटकर रोने लगा।
“घर चलो माँ।”
सरोज देवी ने पूछा—
“क्यों?”
विवेक ने कहा—
“क्योंकि अब घर में आपका इंतजार होगा।”
सरोज देवी कुछ क्षण उसे देखती रहीं।
फिर पूछा—
“और अगर फिर व्यस्त हो गए तो?”
विवेक ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“तो आप मुझे डांटना।”
माँ मुस्कुराईं।
“डांटने के लिए बेटा पास होना चाहिए।”
विवेक ने सिर माँ की गोद में रख दिया।
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जब दोनों घर लौटे तो काव्या दरवाजे पर खड़ी थी।
वह दादी से लिपट गई।
“दादी, अब आप कहीं मत जाना।”
सरोज देवी ने उसे गले लगाते हुए पूछा—
“क्यों?”
काव्या रोते हुए बोली—
“क्योंकि अब मैं आपकी बातें सुनूंगी।”
रचना भी सामने आ गई।
उसने हाथ जोड़ दिए।
“माँजी... मुझे भी माफ कर दीजिए।”
सरोज देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“बहू, रिश्तों में हिसाब रखोगी तो घर दुकान बन जाएगा।”
फिर उन्होंने विवेक की तरफ देखा।
“और बेटा...”
“जी माँ?”
“घर बड़ा करने से पहले इतना देख लेना कि उसमें रहने वालों के दिल एक-दूसरे के लिए जगह बचाए हुए हैं या नहीं।”
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उस दिन विवेक ने घर में कोई बड़ा नियम नहीं बनाया।
उसने बस डाइनिंग टेबल से चार्जर हटा दिए।
टीवी बंद किया।
मोबाइल एक तरफ रखा।
और माँ से कहा—
“माँ, आज आपकी कहानी सुनेंगे।”
सरोज देवी ने पूछा—
“कौन-सी?”
विवेक मुस्कुराया।
“वही जो मैं बचपन में रोज सुनता था... लेकिन अब मुझे याद नहीं।”
माँ ने बेटे को देखा।
उनकी आंखें भर आईं।
उन्होंने कहानी शुरू की।
काव्या दादी की गोद में सिर रखकर सुनती रही।
रचना चुपचाप रसोई से चाय लेकर आई।
और विवेक पहली बार बिना घड़ी देखे अपनी माँ के पास बैठा रहा।
उस रात घर में कोई महंगी चीज नहीं आई थी।
लेकिन बहुत दिनों बाद...
घर में एक खोई हुई चीज वापस आई थी—अपनापन।
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कभी-कभी बूढ़े माता-पिता घर से इसलिए नहीं जाते कि उन्हें कोई दूसरा घर मिल गया होता है।
वे इसलिए चले जाते हैं...
क्योंकि जिस घर को उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देकर बनाया होता है, उसी घर में उन्हें अपने लिए जगह कम पड़ने लगती है।
इसलिए अगर आपके घर में माँ-बाप हैं...
तो आज उनसे यह मत पूछिए—
“आपको किसी चीज की जरूरत है?”
बस उनके पास बैठकर पूछिए—
“माँ, आज आपका मन कैसा है?”
क्योंकि हो सकता है...
उनके पास दवा, कपड़े या पैसे की कमी न हो।
कमी सिर्फ आपकी आवाज की हो।
❤️ और जिस दिन माता-पिता आपकी आवाज सुनने के लिए तरसने लगें, समझिए घर में सब कुछ होते हुए भी घर अधूरा है।
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