दिल बड़ा रखो
एक दिन एक बुज़ुर्ग आदमी हड़बड़ाते हुए शहर के एक जाने-माने, नेकदिल वकील के दफ़्तर में दाखिल हुआ। हाथ में कागज़ों का पुलिंदा, धूप से झुलसा चेहरा, बढ़ी हुई दाढ़ी, और सफेद कुर्ते पर मिट्टी के निशान।
बुज़ुर्ग ने कहा, "वकील साहब, मुझे उसके पूरे फ्लैट पर स्टे लगवाना है। बताइए, क्या कागज़ात चाहिए, कितना खर्चा आएगा — बस काम जल्दी होना चाहिए।"
वकील साहब ने सारे कागज़ात देखे, पूरी जानकारी ली, इस तरह करीब घंटा भर निकल गया। उन्होंने कहा, "मैं इन्हें ध्यान से देख लेता हूँ, फिर आपके केस पर बात करेंगे। अगले शनिवार आइए।"
चार दिन बाद वो बुज़ुर्ग फिर आया, वही कपड़े, चेहरे पर वही गुस्सा — अपने छोटे भाई से नाराज़। वकील ने बैठने को कहा। दफ़्तर में अजीब-सी खामोशी थी।
वकील साहब ने बात शुरू की, "बाबा, मैंने आपके सारे कागज़ात देख लिए हैं, और आपके परिवार के बारे में भी काफी जानकारी जुटाई है। आप दो भाई हैं, एक बहन है, माता-पिता बचपन में ही गुज़र गए थे। आप नौवीं पास हैं और छोटा भाई इंजीनियर है। उसकी पढ़ाई के लिए आपने स्कूल छोड़ा, दूसरों के खेतों में मज़दूरी की। खुद तन ढकने भर कपड़ा और पेट भर खाना भी नसीब नहीं हुआ, फिर भी भाई की पढ़ाई में पैसों की कमी कभी नहीं आने दी। एक बार भाई को बैल ने घायल कर दिया था, आप उसे कंधे पर उठाकर पाँच किलोमीटर पैदल अस्पताल ले गए, जबकि खुद इतनी ताकत रखने की उम्र भी नहीं थी आपकी — पर भाई के लिए जान हाज़िर थी। माँ-बाप के जाने के बाद आपने ही उसके माँ-बाप का फ़र्ज़ निभाया।
फिर भाई को इंजीनियरिंग के अच्छे कॉलेज में दाखिला मिला, आपका दिल खुशी से भर गया। अस्सी हज़ार सालाना फीस भरने के लिए आपने रात-दिन एक कर दिया — पत्नी के गहने गिरवी रखे, साहूकार से कर्ज़ लिया, हर ज़रूरत पूरी की। फिर उसे किडनी की तकलीफ हुई, डॉक्टर ने बदलने को कहा और आपने पल भर में अपनी किडनी दे दी, ये कहते हुए कि 'तुझे अफ़सर बनना है, कहाँ-कहाँ बीमार शरीर लेकर घूमेगा, मुझे तो गाँव में ही रहना है।'
मास्टर्स के लिए वो हॉस्टल गया — लड्डू बनते, देने जाते; मक्का पकती, देने जाते; त्योहार आता, कपड़े देने जाते। पच्चीस किलोमीटर साइकिल चलाकर डिब्बा पहुँचाते, हमेशा पहला निवाला उसे खिलाते। मास्टर्स पास होने पर पूरे गाँव को खाना खिलाया। उसने कॉलेज की ही एक सुंदर लड़की से शादी कर ली — आप बस समय पर पहुँचे, बस इतना ही। नौकरी लगी, तीन साल पहले शादी हुई, आपको लगा अब बोझ हल्का होगा।
पर किसी की नज़र लग गई इस प्यार को। शादी के बाद भाई ने घर आना बंद कर दिया। पूछा तो कहता है, बीवी को वचन दिया है। घर पैसा नहीं भेजता, कहता है कर्ज़ है सिर पर। पिछले साल शहर में फ्लैट खरीदा, पूछा तो कहता है कर्ज़ लिया। मना किया तो कहता है — 'भाई, तुझे कुछ नहीं मालूम, तू गंवार का गंवार ही रह गया।' अब चाहता है, गाँव की आधी ज़मीन बेचकर उसे पैसा दे दो।"
इतना कहकर वकील साहब रुके — "तो तुम चाहते हो, भाई ने जो माँगा वो न देकर, उसके फ्लैट पर ही स्टे लगा दिया जाए? यही चाहते हो, बाबा?"
बुज़ुर्ग ने तुरंत कहा, "हाँ वकील साहब!"
वकील साहब बोले, "हम स्टे ले सकते हैं, प्रॉपर्टी में हिस्सा भी माँग सकते हैं। पर — एक, तुमने उसके लिए जो खून-पसीना बहाया, वो वापस नहीं मिलेगा। दो, तुम्हारी दी हुई किडनी वापस नहीं आएगी। तीन, उसके लिए जो ज़िंदगी लगाई, वो भी लौटकर नहीं आएगी। इन सबके आगे उस फ्लैट की कीमत शून्य है। भाई की नीयत बदल गई, वो अपने रास्ते चला गया — तुम भी उसी कृतघ्नता की राह पर मत जाओ। वो भिखारी निकला, तुम दिलदार थे — दिलदार ही रहो। तुम्हारा हाथ हमेशा ऊपर रहा है, ऊपर ही रखो। कोर्ट-कचहरी में उलझने की बजाय अपने बच्चों को पढ़ाओ। पढ़-लिखकर तुम्हारा भाई बिगड़ गया, इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हारे बच्चे भी वैसे ही निकलेंगे।"
बुज़ुर्ग वकील का मुँह ताकता रह गया। पूरी बात सुनकर वो उठा, कागज़ात समेटे, आँखें पोंछते हुए बोला, "चलता हूँ वकील साहब," और अपनी रुलाई किसी को दिखाए बिना बाहर निकल गया।
इस बात को काफी वक़्त गुज़र गया। एक दिन अचानक वो फिर वकील के दफ़्तर में आया। बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे, साथ में एक नौजवान और हाथ में मिठाई की थैली।
वकील ने कहा, "बाबा, बैठिए।" उसने कहा, "बैठने नहीं, मिठाई खिलाने आया हूँ। ये मेरा बेटा है, बैंक मैनेजर है, बैंगलोर में रहता है, कल गाँव आया था। अब तीन मंज़िला मकान बना लिया है, धीरे-धीरे दस-बारह एकड़ ज़मीन भी खरीद ली।"
वकील साहब उसके चेहरे की खुशी महसूस कर रहे थे।
बुज़ुर्ग ने आगे कहा, "वकील साहब, आपने कहा था कोर्ट-कचहरी के चक्कर में मत पड़ो — कितनी नेक सलाह थी वो, मुझे उलझन से बचा लिया। गाँव में सब लोग भाई के खिलाफ भड़का रहे थे, पर मैंने उनकी नहीं, आपकी बात मानी। अपने बच्चों को पढ़ाई में लगाया, भाई के पीछे अपनी ज़िंदगी बर्बाद नहीं होने दी। कल भाई और उसकी पत्नी घर आए, पैर छूकर माफी माँगी। मैंने भाई को गले लगा लिया, मेरी पत्नी ने उसकी पत्नी को गले लगाया। बरसों बाद पूरे परिवार ने साथ बैठकर खाना खाया। घर में फिर से खुशियाँ लौट आईं।"
वकील साहब के हाथ की मिठाई हाथ में ही रह गई, और उनकी आँखों से आँसू टपक पड़े।
👉 गुस्से को सही दिशा में मोड़ा जाए तो जीवन में कभी पछताना नहीं पड़ता। बस दिल थोड़ा बड़ा रखने की ज़रूरत है।


