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खुशी के वो पल | Hindi Kahani Khushi Ke Wo Do Pal

एक भूली हुई पेंटिंग

लिविंग रूम से पापा की तेज़ आवाज़ें कमरे तक पहुंच रही थीं। मैं दरवाज़े की ओट में छुपकर हर शब्द सुन रहा था।

"शालिनी, आखिर तुम्हें समझ क्यों नहीं आता कि अभी हमारे पास ऐसी बातों के लिए न वक्त है, न पैसा! तुम दो बच्चों की मां हो, पहले घर देखो। ये रंग और ब्रश उठाने से घर का चूल्हा नहीं जलता।"

"मैं तो बस इतना कह रही थी कि पास वाले कम्युनिटी हॉल में एक छोटी सी आर्ट क्लास शुरू हो रही है। दिन में जब बच्चे स्कूल में होते हैं, तब मैं..."

"बस! मैंने कह दिया ना, नहीं। जो दो हज़ार रुपये तुम उस क्लास की फीस में डालोगी, उससे बच्चों के लिए ज़्यादा ज़रूरी सामान आ जाएगा। अब इस बारे में दोबारा बात मत करना।"

पापा हमेशा की तरह अपना फैसला थमाकर ऑफिस निकल गए।

बेटे ने माँ को दिया रंगों का तोहफा — एक भूली हुई पेंटिंग की कहानी जो दिल छू जाएगी


मां वहीं सोफे पर कुछ देर खामोश बैठी रहीं। फिर उठीं और चुपचाप रसोई में जूठे बर्तन धोने लगीं। उनकी आंखों में जो नमी थी, उसे वे नल के पानी की धार में छिपा देना चाहती थीं।

यह कोई नई बात नहीं थी। मेरा नाम कबीर है, उम्र दस साल। मेरी एक छोटी बहन भी है, अवनि, जो अभी सिर्फ पांच बरस की है। पापा एक प्राइवेट बैंक में नौकरी करते हैं, और उनका मानना है कि ज़िंदगी में सिर्फ वही चीज़ें करनी चाहिए जिनसे पैसा बचे या घर का काम आसान हो। शौक, कला, या अपनी पसंद की चीज़ों के लिए उनके हिसाब-किताब में कोई जगह नहीं थी।

मेरी मां, शालिनी, शादी से पहले बहुत खूबसूरत पेंटिंग बनाया करती थीं। नानी के घर आज भी उनकी बनाई कुछ तस्वीरें दीवारों पर टंगी मिल जाती हैं।

लेकिन जब से मैंने होश संभाला, मैंने मां के हाथों में ब्रश की जगह हमेशा कलछी, झाड़ू और मेरी-अवनि की किताबें ही देखीं। घर की पुरानी अलमारी के सबसे ऊपरी खाने में एक लकड़ी का डिब्बा रखा है, जिसमें मां के पुराने सूखे रंग और कुछ पुराने ब्रश बंद पड़े हैं। कई बार दोपहर में जब सब सो रहे होते, मैंने मां को चुपचाप उस डिब्बे की धूल साफ करते और सूखे ब्रशों को उंगलियों से सहलाते देखा है।

हर साल मां का जन्मदिन आता, और पापा हर बार कोई न कोई ऐसा तोहफा लाते जो असल में घर की ज़रूरत होती — कभी नया कुकर, कभी मिक्सर, कभी चादरों का सेट। मां हर बार वो पैकेट खोलतीं, चेहरे पर एक फीकी मुस्कान सजातीं और "थैंक यू" कह देतीं। पापा को लगता वे दुनिया के सबसे समझदार पति हैं जो घर की हर ज़रूरत पूरी कर रहे हैं, पर वे कभी मां की आंखों के कोनों में ठहरी उस उदासी को नहीं पढ़ पाए।

इस बार मां का पैंतीसवां जन्मदिन आने वाला था। मैंने मन ही मन तय कर लिया था — इस बार मां के चेहरे पर मुझे झूठी मुस्कान नहीं, सच्ची खुशी देखनी है। पापा से तो कोई उम्मीद नहीं थी, इसलिए मैंने खुद दिमाग लगाना शुरू किया।

पिछले एक साल से मैं अपनी मिट्टी की गुल्लक में पैसे जमा कर रहा था — कभी कोई रिश्तेदार आता तो कुछ रुपये दे जाता, कभी बाज़ार से सामान लाने पर बचे सिक्के मैं उसी में डाल देता।

मां के जन्मदिन से दो दिन पहले, जब पापा शाम को ऑफिस से लौटे, मैं उनके साथ बाज़ार जाने की ज़िद करने लगा। पापा मुझे पास की एक स्टेशनरी-कम-आर्ट शॉप पर ले गए।

"जल्दी बताओ कबीर, क्या चाहिए? सिर बहुत भारी हो रहा है," पापा ने झल्लाते हुए कहा।

मैं सीधा उस सेक्शन में गया जहां कैनवास और ऑयल कलर्स रखे थे। एक मध्यम आकार का सफेद कैनवास बोर्ड और रंगों का डिब्बा उठा लिया।

पापा ने देखा तो भौंहें चढ़ गईं। "ये क्या है? स्कूल से तो ऐसा कुछ मंगवाया नहीं गया। इतने महंगे रंग किसलिए? रख दो वापस, मैं तुम्हें मोम वाले क्रेयॉन दिला देता हूं।"

मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। मैंने अपनी जेब से गुल्लक तोड़कर निकाले हुए सारे सिक्के और मुड़े-तुड़े नोट काउंटर पर रख दिए।

"पापा, मुझे आपसे पैसे नहीं चाहिए। मेरे पास हैं। प्लीज़, मुझे ये लेने दीजिए।"

दुकानदार ने पैसे गिने, "बेटा, ये तो सिर्फ चार सौ रुपये हैं, और इस कैनवास-रंगों का बिल साढ़े पांच सौ बन रहा है। कुछ कम करना पड़ेगा।"

मेरा चेहरा उतर गया। मैं रंगों का डिब्बा वापस रखने ही वाला था कि पापा ने गहरी सांस ली, बटुआ निकाला और पूछा, "बाकी कितने देने हैं?"

"डेढ़ सौ रुपये, साहब।"

पापा ने पैसे दिए और हम वो सामान लेकर घर लौट आए। रास्ते भर वे बड़बड़ाते रहे कि मैं फालतू चीज़ों में पैसे उड़ा रहा हूं। मैंने उन्हें नहीं बताया कि यह सामान किसके लिए है — डर था कहीं वे डांटकर वापस न करवा दें।

अगले दिन मां का जन्मदिन था।

सुबह पापा ने हमेशा की तरह एक बड़ा-सा डिब्बा मां के सामने रखा। "हैप्पी बर्थडे शालिनी! नया इंडक्शन स्टोव है, अब गैस खत्म होने की टेंशन नहीं रहेगी।"

मां ने वही पुरानी बनावटी मुस्कान लिए कहा, "बहुत अच्छा है जी, शुक्रिया।"

तभी मैं अपने कमरे से दौड़ता हुआ बाहर आया। मैंने अपना तोहफा पुराने अखबार में लपेट रखा था। "हैप्पी बर्थडे मां! ये मेरी तरफ से।"

पापा मुस्कुराए, "देखते हैं, साहबज़ादे अपनी जमा-पूंजी से क्या लाए हैं।"

मां ने अखबार खोला। जैसे ही उनकी नज़र उस कोरे सफेद कैनवास और रंगों के डिब्बे पर पड़ी, उनके हाथ कांपने लगे। वे वहीं फर्श पर बैठ गईं, आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उन्होंने वो कोरा कैनवास सीने से लगा लिया, जैसे कोई खोया हुआ बच्चा बरसों बाद मिला हो। वे सुबकने लगीं।

पापा हैरान रह गए, "अरे शालिनी, रो क्यों रही हो? ये तो कबीर अपने लिए..."

"नहीं पापा," मैंने बीच में टोकते हुए कहा, "ये मैंने मां के लिए लिया है। मां बहुत अच्छी पेंटिंग बनाती थीं, पर उनके रंग बहुत पहले सूख गए। मैं चाहता हूं मां फिर से पेंटिंग करें।"

पापा एकदम खामोश हो गए। वे मां का चेहरा देख रहे थे। दस साल की शादी में उन्होंने मां को नई साड़ी या गहनों पर भी इतना भावुक होते नहीं देखा था, जितना आज इस मामूली सफेद कैनवास को देखकर वे हो रही थीं। पापा को पहली बार गहराई से समझ आया कि 'ज़रूरत' और 'खुशी' में कितना फर्क होता है। उन्होंने इंडक्शन स्टोव देकर घर की ज़रूरत पूरी की थी, लेकिन एक दस साल के बच्चे ने कैनवास देकर एक बुझती हुई रूह को फिर से जिंदा कर दिया था।

पापा धीरे से मां के पास बैठे। उनकी आंखों में भी आज पछतावे के आंसू थे। उन्होंने मां के कंधे पर हाथ रखा और भर्राए गले से बोले, "मुझे माफ कर दो शालिनी। मैं एक मशीन बन गया था जो सिर्फ घर के खर्च और राशन की लिस्ट देखता रहा। मैं भूल ही गया था कि तुम्हारे अंदर भी एक इंसान है, जिसके अपने सपने हैं। कल से तुम उस आर्ट क्लास में जाओगी, घर मैं संभाल लूंगा।"

मां ने अविश्वास से पापा को देखा, फिर मुझे कसकर गले लगा लिया। उस दिन के बाद से घर की दीवारें धीरे-धीरे खूबसूरत पेंटिंग्स से सजने लगीं। पापा अब वीकेंड पर खुद बाज़ार से मां के लिए नए-नए रंग लेकर आते हैं।

मेरे एक छोटे-से कैनवास ने हमारे घर को उन रंगों से भर दिया, जो शायद हमेशा के लिए सूख जाते।

क्या आपके घर में भी किसी ने ज़िम्मेदारियों के बोझ तले अपना कोई शौक दबा रखा है? एक बार उन्हें उनका वो पुराना शौक लौटाकर देखिए — शायद पूरे घर का माहौल ही बदल जाए।

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