माँ की आखिरी सीख
रामू एक छोटे से गाँव में अपनी माँ के साथ रहता था। पिता का साया बचपन में ही सिर से उठ गया था। माँ मजदूरी करके किसी तरह घर चलाती थी और रामू को पढ़ा रही थी।
रामू
पढ़ने
में
तेज
था,
पर
घर
की
गरीबी
उसे
हमेशा
शर्मिंदा करती
थी।
स्कूल
में
जब
बाकी
बच्चे
नए
कपड़े
और
टिफिन
लाते,
तो
रामू
अपने
फटे
बस्ते
और
सूखी
रोटी
को
छुपाने
की
कोशिश
करता।
एक
दिन
उसने
माँ
से
गुस्से
में
कह
दिया,
"हम
इतने
गरीब
क्यों
हैं?
काश
हमारे
पास
भी
पैसा
होता।"
माँ
कुछ
नहीं
बोली।
उसने
रामू
का
हाथ
पकड़ा
और
उसे
पास
के
खेत
में
ले
गई,
जहाँ
एक
बूढ़ा
किसान
अकेले
बैठा
रो
रहा
था।
पूछने
पर
पता
चला
कि
उसका
बेटा
शहर
जाकर
अमीर
तो
बन
गया,
पर
अब
उसे
अपने
बूढ़े
बाप
की
सूरत
तक
देखना
गवारा
नहीं।
माँ
ने
रामू
से
कहा,
"बेटा,
पैसा
जिंदगी
को
आसान
बना
सकता
है,
पर
संस्कार जिंदगी
को
सही
बनाते
हैं।
मैं
तुझे
अमीर
नहीं
बना
पाई,
पर
इतना
जरूर
सिखाया
है
कि
तू
कभी
अपनी
जड़ों
को
न
भूले।"
सालों
बाद
रामू
एक
बड़ा
इंजीनियर बना।
उसने
अपनी
पहली
तनख्वाह से
माँ
के
लिए
घर
नहीं,
बल्कि
उस
बूढ़े
किसान
के
लिए
एक
छोटी
सी
झोपड़ी
बनवाई
और
खुद
हर
महीने
उससे
मिलने
जाता
रहा।
सीख: पैसा कमाना
जरूरी
है,
पर
रिश्तों और
संस्कारों को
कभी
पैसों
से
मत
तोलिए।
जो
माता-पिता हमें बड़ा
करते
हैं,
उनका
साथ
किसी
भी
सफलता
से
ज्यादा
कीमती
है।


