गूंगी भक्ति
काशी के पास एक छोटे से गांव में गंगू नाम का एक चरवाहा रहता था। वह न तो पढ़ा-लिखा था, न ही उसे कोई मंत्र या पूजा-विधि आती थी। हर शाम अपने मवेशी चराकर लौटते वक्त वह गांव के बाहर बने एक पुराने शिव मंदिर में रुक जाता।
मंदिर में कोई पुजारी नहीं था, बस एक टूटा-फूटा शिवलिंग था, जिसकी कोई देखभाल नहीं करता था। गंगू रोज वहां जाकर अपने पास जो भी होता — कभी जंगली फूल, कभी कुछ बेर, कभी सिर्फ थोड़ा सा दूध — शिवलिंग के सामने रख देता और कहता, "बाबा, यही है मेरे पास, आप ले लो।"
एक दिन गांव में एक बड़े विद्वान पंडित आए। उन्होंने देखा कि गंगू बिना किसी विधि-विधान के, बिना मंत्र जाने, सीधे शिवलिंग से बातें कर रहा है। पंडित को यह अटपटा लगा। उन्होंने गंगू को टोका, "मूर्ख, यह भगवान से बात करने का तरीका नहीं है। पहले शास्त्र सीखो, संस्कृत सीखो, तब पूजा करना।"
गंगू उदास हो गया। उसे लगा कि वह अब तक जो कर रहा था, वह गलत था। उस दिन से उसने मंदिर जाना बंद कर दिया, यह सोचकर कि जब तक विधि नहीं सीखेगा, भगवान उसकी बात नहीं सुनेंगे।
उधर मंदिर सूना हो गया। कुछ दिनों बाद उसी पंडित ने रात को एक सपना देखा। सपने में शिवजी स्वयं प्रकट हुए और बोले, "पंडित, तुमने मुझसे मेरा सबसे प्रिय भक्त छीन लिया। गंगू के फूल और बेर में जो प्रेम था, वह तुम्हारे मंत्रों में भी नहीं है।"
पंडित की नींद टूट गई। उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। अगली सुबह वे खुद गंगू के घर गए और बोले, "बेटा, मुझसे गलती हुई। भगवान को शब्द नहीं, भाव प्यारे होते हैं। तुम जैसे पहले पूजा करते थे, वैसे ही करो।"
गंगू फिर मंदिर जाने लगा। उसकी सीधी-सच्ची भक्ति देखकर धीरे-धीरे पूरा गांव उसी मंदिर में पूजा करने आने लगा।
सीख: भगवान तक पहुंचने के लिए बड़े शब्दों या विधियों की नहीं, सच्चे और निश्छल मन की ज़रूरत होती है। भक्ति की भाषा भाव से बनती है, ज्ञान से नहीं।


