Type Here to Get Search Results !

Ads

image

एक विश्वास hindi kahaniya

एक भरोसा, एक रिश्ता 

मेरी बेटी रिया की शादी तय हो चुकी थी, और मैं कुछ दिनों की छुट्टी लेकर तैयारियों में जुटा हुआ था। उस दिन बाहर से लौटा तो पत्नी ने एक लिफाफा थमाया। नाम अनजाना नहीं था — 'करण मेहता' — एक ऐसा नाम जिसे सुने बरसों बीत गए थे।


5000 रुपये का भरोसा — जो लौटकर आया करोड़ों की खुशियाँ लेकर



लिफाफा खोला तो अंदर एक लाख डॉलर का चेक और एक चिट्ठी थी। इतनी बड़ी रकम, वो भी मेरे नाम! जल्दी से चिट्ठी खोलकर एक साँस में पढ़ गया। लिखा था —

"आदरणीय सर, ये एक छोटी-सी भेंट है। मुझे नहीं लगता आपके एहसान का कर्ज़ मैं कभी चुका पाऊँगा। ये उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है। घर पर सबको प्रणाम। आपका करण।"

बरसों पुराने दिन आँखों के सामने किसी फिल्म की तरह घूमने लगे।

एक बार कोलकाता में टहलते हुए मैं एक किताबों की दुकान में अपनी पसंदीदा पत्रिकाएँ देख रहा था, तभी बाहर किताबों के एक छोटे-से ढेर के पास खड़े एक लड़के पर नज़र पड़ी। वो हर आते-जाते सजे-धजे शख्स से कुछ विनती करता, और कोई जवाब न मिलने पर निराश होकर वापस अपनी जगह खड़ा हो जाता।

मैं काफी देर तक चुपचाप देखता रहा। उसके चेहरे की निराशा आम फुटपाथ विक्रेताओं जैसी नहीं थी। आखिर मुझसे रहा नहीं गया और मैं उसके पास चला गया। लड़का कुछ साधारण विज्ञान की किताबें बेच रहा था।

मुझे देखकर उसकी आँखों में फिर उम्मीद जगी। साफ-सुथरा, चेहरे पर आत्मविश्वास, पर कपड़े बेहद मामूली — कड़ाके की ठंड में सिर्फ एक हल्का स्वेटर पहने हुए।

किताबें मेरे किसी काम की नहीं थीं, फिर भी न जाने क्यों पूछ बैठा, "बेटा, ये सारी किताबें कितने की हैं?"

"आप जितना दे सकें, सर," वो बोला।

"अरे, कुछ तो सोचा होगा तुमने।"

"5 हज़ार," वो हल्की कड़वाहट में बोला।

"इन किताबों की तो 500 भी बहुत है," मुझसे अनायास निकल गया। तुरंत महसूस हुआ कि मैंने ग़लत कह दिया — उसका चेहरा उतर गया, जैसे किसी ने निराशा उड़ेल दी हो।

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और नरमी से पूछा, "बेटा, तुम किताब बेचने वाले नहीं लगते। सच-सच बताओ, क्या ज़रूरत है?"

वो जैसे फूट पड़ा। शायद बहुत दिनों की निराशा अब बर्दाश्त से बाहर हो चुकी थी।

"सर, मैंने बारहवीं पास कर ली है। पिताजी एक छोटे-से ढाबे में काम करते हैं। मेरा मेडिकल में दाखिला हो गया है, पर फीस के लिए पैसे चाहिए। पिताजी कुछ दे पाएँगे, बाकी का इंतज़ाम नहीं हो पा रहा," उसने एक साँस में अच्छी अंग्रेज़ी में कहा।

"तुम्हारा नाम क्या है?" मैंने पूछा।

"करण मेहता।"

"करण हो और हिम्मत हार रहे हो? कितना चाहिए?"

"5 हज़ार," इस बार आवाज़ में गिड़गिड़ाहट थी।

"अगर मैं दे दूँ, तो लौटा पाओगे? इन किताबों की तो इतनी कीमत भी नहीं," मैंने हँसते हुए पूछा।

"सर, आपने ही तो कहा मैं भरोसे के लायक हूँ। मुझ पर यकीन कीजिए। चार दिन से यहाँ आ रहा हूँ, आप पहले हैं जिन्होंने इतना पूछा। पैसे का इंतज़ाम न हुआ तो शायद किसी होटल में बर्तन धोते मिलूँगा," उसकी आवाज़ में डूबते भविष्य की आशंका थी।

दिमाग उसे धोखेबाज़ मान रहा था, पर दिल कुछ और कह रहा था। आखिर दिल जीत गया। मैंने पर्स से 5 हज़ार रुपए — जो शेयर बाज़ार में लगाने सोचे थे — निकालकर उसे थमा दिए।

"बेटा, मुझे नहीं पता तुम्हारी बात में कितनी सच्चाई है, पर दिल कहता है मदद करनी चाहिए। मेरी बेटी रिया भी तुमसे कुछ साल छोटी है — सोचूँगा उसी के लिए कोई खिलौना ले लिया," मैंने कहा।

लड़का सन्न रह गया, आँखों में आँसू आ गए। उसने पैर छुए, और दो बूँदें मेरे पैरों को छू गईं।

"किताबें आपकी गाड़ी में रख दूँ?"

"ज़रूरत नहीं, अपने पास ही रखो। ये मेरा कार्ड है, कभी भी ज़रूरत हो तो बताना।"

वो वहीं मूर्ति बना खड़ा रहा, मैंने उसका कंधा थपथपाया और गाड़ी आगे बढ़ा दी। रास्ते भर सोचता रहा कि ये मैंने कैसा जुआ खेल दिया — किसी को पता चलता तो भावुक मूर्ख ही कहता। इसलिए ये बात किसी को न बताने का फैसला किया।

दिन बीतते गए। करण ने मेडिकल में दाखिले की खबर एक चिट्ठी से दी। मेरी उस "मूर्खता" में मुझे थोड़ी इंसानियत नज़र आई। दिल के भीतर बैठे किसी अनजान भाव ने प्रेरित किया कि उसके पते पर कुछ और पैसे भेज दूँ। भावनाएँ फिर जीत गईं, मैंने फिर वही "मूर्खता" दोहराई।

समय गुज़रता गया। उसकी छोटी-छोटी चिट्ठियाँ आतीं — कुछ लाइनें मेरे लिए, कुछ अपनी पढ़ाई पर, और एक लाइन हमेशा रिया के लिए, जिसे वो अपनी बहन कहता। मैं फिर वही करता, और भूल जाता। न कभी उससे मिलने गया, न वो कभी घर आया।

एक दिन खबर आई कि वो आगे की पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया जा रहा है, स्कॉलरशिप मिल गई थी — और रिया के लिए एक लाइन लिखना वो तब भी नहीं भूला। मुझे अपनी उस मूर्खता पर दोबारा गर्व हुआ, बिना उस बात की सच्चाई जाने।

समय पंख लगाकर उड़ता रहा। करण की शादी का कार्ड आया — वो शायद ऑस्ट्रेलिया में ही बसने वाला था। रिया भी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी, एक अच्छे परिवार में उसका रिश्ता तय हुआ। अब शादी की तैयारियों के लिए काफी पैसों की ज़रूरत थी — इंतज़ाम की उधेड़बुन में मैं था, और तभी वो चेक आया।

मैंने करण को याद करके रिया की शादी का एक कार्ड भी भेज दिया।

शादी की गहमागहमी में एक बड़ी गाड़ी पोर्च में आकर रुकी। ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला, एक सुसंस्कृत-सा शख्स उतरा, साथ में उसकी पत्नी और गोद में एक बच्चा। मुझे लगा जैसे इस चेहरे को पहले भी कहीं देखा है।

उसने आकर मेरे और पत्नी के पैर छुए। "सर, मैं करण..." बड़ी श्रद्धा से बोला।

मैं उसे गर्व से गले लगा बैठा। उसका बेटा मेरी पत्नी की गोद में जैसे घर जैसा महसूस करने लगा। रिया अभी भी हैरान थी। करण ढेर सारे उपहार लाया था, रिया को बड़े अपनेपन से गले लगाया — रिया को भाई मिलने की खुशी थी।

करण ने शादी में बड़े भाई की हर ज़िम्मेदारी निभाई, न मुझ पर कोई बोझ डाला, न एक पैसा भी खर्च करने दिया। उसके भारत में रहने के वो दिन जैसे पंख लगाकर उड़ गए।

जब वो वापस ऑस्ट्रेलिया लौटा, हवाई अड्डे पर उसे विदा करते हुए मेरी, पत्नी की, रिया की — सबकी आँखें नम थीं। जहाज़ ऊँचा और ऊँचा आसमान छूने चला गया, और उसी के साथ मेरा भरोसा भी आसमान छूने लगा।

मैं अपनी उस "मूर्खता" पर एक बार फिर गर्वित था, और सोच रहा था — इस दुनिया को चलाने वाला कोई भगवान है भी, तो शायद वो हमारा भरोसा ही है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Top Post Ad

Below Post Ad