Type Here to Get Search Results !

Ads

image

भाई का बलिदान: बाइक का सपना छोड़कर बहन को दी नई साइकिल

भाई का बलिदान

रोहन आज बेहद उत्साहित था। बरसों पुराना उसका एक ही सपना था — किसी फिल्मी हीरो की तरह अपनी खुद की बाइक पर सवार होकर गली-मोहल्ले में घूमना। कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ वह शाम को दो जगह ट्यूशन पढ़ाता, हर महीने थोड़े-थोड़े पैसे बचाता, और लगभग एक साल की मेहनत के बाद उसके पास बारह हज़ार रुपये जमा हो चुके थे। उसके दोस्त मयंक ने कल ही बताया था कि एक सेकंड-हैंड बाइक बिल्कुल उसके बजट में मिल रही है। रोहन ने मन ही मन ठान लिया था — आज वह बाइक लेकर आएगा और सबको चौंका देगा।

उसे याद था कि कैसे बचपन में उसने अपने पिता से यह ख्वाहिश जताई थी। पर पिता का जवाब हमेशा एक जैसा होता — "बेटा, तुम्हारी पढ़ाई का खर्च ही बहुत है। ऐसे शौक पालने के लिए खुद कमाओ। तुम्हारी छोटी बहन की भी ज़िम्मेदारी है मुझ पर।" रोहन उस वक्त मन मसोसकर रह जाता, पर उसे भरोसा था कि एक दिन पिता ज़रूर उसकी यह इच्छा पूरी करेंगे।

भाई का बलिदान: बाइक का सपना छोड़कर बहन को दी नई साइकिल


मगर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। एक सड़क दुर्घटना में पिता का साया सिर से उठ गया। उसके बाद माँ, छोटी बहन प्रिया और रोहन — तीन लोगों का यह छोटा परिवार एक किराए के मकान में गुज़र-बसर करने लगा। माँ आसपास के घरों से सिलाई का काम लेतीं, और रोहन ट्यूशन पढ़ाकर घर चलाने में मदद करता। इतनी मेहनत के बीच भी उसके दिल में बाइक की चाहत कभी नहीं मरी।

उस दिन ट्यूशन खत्म करके रोहन गुनगुनाते हुए बाहर निकलने ही वाला था कि उसने प्रिया को कुर्सी पर मायूस बैठे देखा।

"अरे, तू आज स्कूल नहीं गई? इस वक्त तो तेरी क्लास चलती है ना?"

"हाँ भैया, पर आज सिमरन नहीं आई और मेरी स्कूल बस छूट गई।"

"वो नहीं आई तो तेरी बस कैसे छूटी?"

"भैया, आपको तो पता है सिमरन अपनी साइकिल से स्कूल जाती है और मैं उसके साथ ही चली जाती हूँ। कभी-कभी मैं चलाती हूँ, कभी वो — बस का झंझट ही खत्म। पर आज वो नहीं आई, मैं आधा घंटा इंतज़ार करती रही, फिर पता चला वो तीन दिन के लिए बीमार होकर घर पर है।"

"अच्छा... इसीलिए मेरी गुड़िया का मुँह उतरा हुआ है। कोई बात नहीं, कल से जल्दी निकल जाना। मैं अभी बाज़ार जा रहा हूँ — जब लौटूँगा तो देखना, तेरा भाई बिल्कुल हीरो जैसा दिखेगा!" इतना कहकर रोहन ज़ोर से हँसा, ताकि माँ भी सुन ले और समझ जाए कि आज घर में बाइक आने वाली है।

शाम को रोहन एक मिठाई का डिब्बा लिए घर में दाखिल हुआ। "प्रिया... ज़रा इधर आ! आज मेरा सपना पूरा हो गया!"

"क्या हुआ भैया, मेरा मन नहीं कुछ खाने का।"

"अरे ले तो सही, सबका मुँह मीठा करवा!" कहते हुए उसने प्रिया के हाथ में डिब्बे के साथ एक लिफाफा भी थमा दिया।

"ये क्या है भैया?"

"खोलकर देख तो!"

प्रिया ने बेमन से लिफाफा खोला — और उसकी आँखें छलक पड़ीं। यह एक नई साइकिल की रसीद थी।

माँ चौंक गईं, "साइकिल?! पर तू तो बाइक के लिए पैसे जोड़ रहा था। मुझे मालूम है, मैंने कल तेरी मयंक से हुई बातचीत भी सुनी थी।"

"हाँ माँ, बाइक का सपना अब भी है, पर वो कभी भी पूरा हो सकता है। आज जब मैंने प्रिया को उदास देखा और सुना कि उसकी वजह से उसकी पढ़ाई पर असर पड़ रहा है, तो मुझसे रहा नहीं गया। दुकान पर साइकिल चुनते वक्त अचानक पापा की याद आ गई। तब समझ आया, वो हमेशा अपनी हर ख्वाहिश को दबाकर हमारे लिए दिन-रात मेहनत करते थे। आज मुझे भी प्रिया एक छोटी बहन नहीं, बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी की तरह महसूस हुई।"

"भैया..." कहकर प्रिया रोहन के गले लग गई।

दीवार पर टंगी पिता की तस्वीर को देखकर माँ की आँखों में आँसू आ गए। वे धीरे से बुदबुदाईं, "आप हमेशा कहते थे — एक दिन आपका त्याग बेटे को ज़रूर समझ आएगा। आज वो दिन आ ही गया।" इतना कहकर उन्होंने रोहन और प्रिया, दोनों को अपने सीने से लगा लिया।

भावुक कहानी, भाई बहन का प्यार, त्याग की कहानी, हिंदी इमोशनल स्टोरी, फैमिली स्टोरी हिंदी

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Top Post Ad

Below Post Ad