अपने हाथों की फसल
मालवगढ़ के राजा प्रतापसिंह को अपने राज्य के अन्न भंडार पर बहुत गर्व था। हर साल फसल कटने पर वे एक बड़ा अन्न-उत्सव मनाते, जिसमें राज्य भर के किसान अपनी सबसे अच्छी फसल लेकर आते।
एक साल राजा ने सोचा कि इस उत्सव को और भव्य बनाना चाहिए। उन्होंने आदेश दिया कि राजमहल के प्रांगण में ही सारी फसल इकट्ठा की जाए, ताकि पूरा नगर एक साथ उसे देख सके।
राजकर्मचारी गांव-गांव गए और किसानों के खेतों से अनाज की बोरियां उठाकर महल ले आए। किसानों ने विरोध नहीं किया, क्योंकि आदेश राजा का था। महल का प्रांगण अनाज के ढेरों से भर गया। देखने में यह बहुत सुंदर लगा, और नगरवासी इसकी खूब प्रशंसा करने लगे।
लेकिन कुछ ही दिनों में मौसम बदला। बारिश हुई, और खुले प्रांगण में रखा अनाज भीग कर सड़ने लगा। जो अनाज किसानों ने महीनों की मेहनत से उगाया था, वह कुछ ही दिनों में बर्बाद हो गया।
अगले साल जब उत्सव का समय आया, तो राज्य में अनाज की भारी कमी हो गई। किसानों ने खेतों में पहले जितनी मेहनत नहीं की थी — उनके मन में यह सवाल था कि जब फसल वैसे भी महल में जबरन ले ली जाएगी, तो मेहनत का क्या फायदा।
राजा चिंतित होकर अपने गुरु के पास गए। गुरु ने पूरी बात सुनकर कहा, "राजन, आपने कभी खुद अपने हाथों से एक बीज बोकर उसे बड़ा किया है?"
राजा ने न में सिर हिलाया।
गुरु मुस्कुराए, "जिस चीज़ को हम खुद अपने पसीने से सींचते हैं, उसकी कदर हमें अपने आप समझ आ जाती है। पर दूसरे की मेहनत को हम बिना सोचे उठा लेते हैं, क्योंकि उसकी तकलीफ हमने खुद नहीं झेली।"
राजा को अपनी भूल समझ आई। उन्होंने उसी दिन आदेश वापस लिया और घोषणा की कि अब हर किसान अपनी फसल अपने खेत में ही रखेगा, और उत्सव उन्हीं के खेतों में जाकर मनाया जाएगा।
अगले साल से राज्य में पहले से भी बेहतर फसल हुई, और अन्न-उत्सव फिर से अपनी पुरानी रौनक पर लौट आया।
सीख: जो हम खुद मेहनत करके पाते हैं, उसकी कीमत हमें समझ आती है। दूसरों की मेहनत का सम्मान करना ही असली नेतृत्व की पहचान है।


