अपना घोंसला
रिटायर्ड स्कूल-मास्टर राधेश्याम जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी अपने दो बेटों को पढ़ाने-लिखाने और अच्छे से स्थापित करने में लगा दी। दोनों बेटे अच्छी नौकरियों में गए, शादी हुई, और राधेश्याम जी अपनी पत्नी के साथ बड़े से घर में रहते रहे।कुछ साल बाद पत्नी का देहांत हो गया। राधेश्याम जी अकेले रह गए। शुरू में बेटे-बहुएं ध्यान रखते थे, पर धीरे-धीरे व्यस्तता बढ़ती गई। पहले उनका बड़ा कमरा "बच्चों की पढ़ाई" के लिए मांग लिया गया, फिर बरामदे वाला छोटा कमरा भी किसी और काम के लिए चाहिए हो गया।
राधेश्याम जी कुछ नहीं बोले। वे सोचते, "मेरे ही घर में, मेरी ही चीज़ें, फिर भी मुझसे पूछा तक नहीं जाता।"
एक दिन बेटों ने तय किया कि पूरा परिवार दस दिन के लिए पहाड़ों पर घूमने जाएगा। जाते वक्त बड़े बेटे ने बस इतना कहा, "बाबूजी, घर में एक नौकर है, खाना बना देगा, आप संभाल लीजिएगा।" राधेश्याम जी के जवाब का इंतज़ार किए बिना सब निकल गए।
उस रात राधेश्याम जी बहुत देर तक अकेले बैठे सोचते रहे। उन्हें याद आया, स्कूल में पढ़ाते वक्त वे बच्चों से हमेशा कहते थे, "अपने पैरों पर खड़ा होना सीखो, किसी के भरोसे मत बैठो।" आज वही सीख उन्हें खुद अपनाने की ज़रूरत थी।
अगली सुबह उन्होंने एक पुराने शागिर्द को फोन किया, जो अब प्रॉपर्टी का काम करता था। कुछ ही हफ्तों में घर बिक गया। राधेश्याम जी ने पैसे अपने नाम बैंक में जमा किए और शहर के एक अच्छे वृद्ध-सुविधा वाले अपार्टमेंट में शिफ्ट हो गए, जहां हमउम्र लोगों का साथ था, रोज़ सुबह की सैर थी, और कोई किसी पर बोझ नहीं था।
वे अब पास के एक स्कूल में मुफ्त में बच्चों को पढ़ाने जाते, और शाम को अपने जैसे बुज़ुर्ग साथियों के साथ चाय पर गपशप करते। जीवन में जो शांति वर्षों से नहीं थी, वह लौट आई।
बेटे जब पहाड़ों से लौटे, तो घर के बाहर "यह मकान बिक चुका है" का बोर्ड देखकर स्तब्ध रह गए। नए मालिक से उन्हें सारी बात पता चली। पछतावा तो हुआ, पर अब बहुत देर हो चुकी थी।
सीख: अपने बुढ़ापे की गरिमा और खुशी को किसी और के भरोसे मत छोड़िए। अपने पैरों पर खड़ा रहना और अपनी शर्तों पर जीना ही असली सुरक्षा है।

