काशी में मोहन नाम का एक गरीब पुजारी रहता था। रोज सुबह मंदिर की सफाई करता, फूल चढ़ाता और मन ही मन भगवान से बातें करता। घर में खाने के लाले पड़ते, पर उसकी भक्ति में कभी कमी नहीं आई।
एक
दिन
एक
साधु
भेष
में
व्यक्ति मंदिर
आया
और
बोला,
"तुम
रोज
इतनी
सेवा
करते
हो,
पर
भगवान
तो
तुम्हें दिखते
भी
नहीं।
फिर
क्यों
करते
हो?"
मोहन
मुस्कुराया, "मैं भगवान
को
दिखाने
के
लिए
सेवा
नहीं
करता,
अपने
मन
की
शांति
के
लिए
करता
हूं।
अगर
वो
मिल
जाएं,
तो
सौभाग्य, न
मिलें
तो
भी
मेरी
भक्ति
में
कमी
नहीं
आएगी।"
साधु
ने
कहा,
"अगर
मैं
तुम्हें एक
थैली
सोना
दूं,
बदले
में
तुम्हें भगवान
की
मूर्ति
बेचनी
होगी।
करोगे?"
मोहन
ने
बिना
एक
पल
सोचे
कहा,
"चाहे
भूखा
मर
जाऊं,
अपने
आराध्य
को
नहीं
बेचूंगा।"
साधु
की
आंखों
में
चमक
आ
गई।
उसने
अपना
असली
रूप
दिखाया
— वो
साक्षात भगवान
थे,
जो
उसकी
परीक्षा लेने
आए
थे।
उन्होंने कहा,
"मोहन,
तेरी
भक्ति
सच्ची
है
क्योंकि तूने
मुझसे
कभी
कुछ
मांगा
नहीं,
बस
दिया
ही
दिया।"
उस
दिन
के
बाद
मोहन
का
जीवन
बदल
गया,
पर
सबसे
बड़ा
बदलाव
उसके
अंदर
आया
— उसे
एहसास
हुआ
कि
सच्ची
भक्ति
में
कोई
शर्त
नहीं
होती।
सीख: सच्ची भक्ति
या
सच्चा
प्रेम
बिना
किसी
स्वार्थ के
होता
है।
जब
हम
बिना
उम्मीद
के
अच्छे
कर्म
करते
हैं,
तभी
उनकी
असली
कीमत
होती
है।


