बेटियाँ भी माँ-बाप का उतना ही ख्याल रखती हैं
अपनी प्लेट में दो तरह की आइसक्रीम का मज़ा लेते हुए सुनीता ने अपने देवर विनोद से कहा, "क्या देवर जी, तीसरी बेटी होने पर भी कोई पार्टी देता है भला? अब से दहेज़ के लिए पैसे जोड़ना शुरू कर दो।"
भाभी की भरी प्लेट देख मुस्कुराते हुए विनोद बोला, "अरे भाभी, आप क्यों चिंता करती हैं? घर में खुशी आई थी तो सबके साथ बाँट ली, और वैसे भी बेटियाँ अपना भाग्य साथ लेकर आती हैं।"
देवर की बात सुनकर सुनीता बस मुस्कुरा भर दी, पर अंदर ही अंदर उसे बड़ी तसल्ली हो रही थी — देवर के घर तीसरी बेटी हुई थी, और सुनीता के खुद दो बेटे थे, जिस पर उसे बड़ा घमंड रहता।
दो-तीन दिन में सारे मेहमान चले गए। अब घर में थे विनोद, उसकी पत्नी रुचि, और तीनों बेटियाँ — मानवी, अंकिता, और सबसे छोटी, जिसका नाम रखा गया प्रीति।
समय अपनी रफ़्तार से बढ़ता गया। तीनों बेटियाँ एक से बढ़कर एक थीं — पढ़ाई में भी, माँ का हाथ बँटाने में भी। घर की दीवारें उनकी बनाई खूबसूरत पेंटिंग्स से सजतीं, अलमारियाँ उनके जीते मेडल और ट्रॉफी से भरी रहतीं। तीनों बेटियों की हँसी-किलकारी से विनोद और रुचि का घर हमेशा गुलज़ार रहता।
सुनीता कोई मौका नहीं छोड़ती थी रुचि को याद दिलाने का कि वो बेटियों की माँ है — "देख रुचि, चाहे जितने इनाम जीत लें ये लड़कियाँ, दहेज़ तो फिर भी लगेगा ही, जोड़ना शुरू किया कि नहीं?"
रुचि जब जेठानी की इन बातों से घबरा जाती, तो विनोद उसे समझाता, "बेटियाँ अपना भाग्य लेकर आती हैं रुचि, हमें बस उन्हें सही राह दिखानी है। देखना, किसी बेटे वालों से कम सुख नहीं देंगी हमारी ये तीनों।"
जब कोई पूछता, "विनोद जी, कब तक किराए के मकान में रहेंगे, अपना घर नहीं बनवाना क्या?" — तो विनोद हँसकर जवाब देता, "जब मेरी बच्चियाँ कुछ बन जाएँगी, तो समझो मेरा घर भी बन जाएगा। अभी तो बस इनका भविष्य बनाना है।"
समय बीतता गया, और रुचि-विनोद की मेहनत रंग लाई। मानवी की बैंक में नौकरी लग गई, अंकिता सीए बनकर जॉब करने लगी, और प्रीति इंजीनियरिंग पूरी कर दिल्ली में काम करने लगी।
एक दिन मानवी ने अपनी बड़ी मम्मी सुनीता को फोन किया, "बड़ी मम्मी, कल माँ-पापा की एनिवर्सरी की छोटी-सी पार्टी रखी है, आप सब समय से आ जाना।"
तीनों बहनों ने बड़े मन से तैयारियाँ की थीं — शहर के सबसे अच्छे होटल में हॉल बुक था, खाने का मेनू खुद चुना था, और माँ-पापा के लिए एक गिफ्ट सबके लिए सरप्राइज़ था।
पार्टी वाले दिन सुबह-सुबह प्रीति भी दिल्ली से आ गई, उसके आते ही घर में रौनक छा गई। "ये क्या माँ, बालों में इतनी सफेदी कैसी? ऐसे जाओगी पार्टी में?" प्रीति ने पूछा। रुचि हँसकर बोली, "मुझे कौन देखने वाला है वहाँ, अब तो तुम बच्चों के दिन हैं।" "नहीं माँ, अभी चलो पार्लर," कहकर प्रीति माँ को पार्लर ले गई और हल्के मेकअप और सुंदर साड़ी में सजा दिया। विनोद के लिए भी एक शानदार सूट तैयार था, जिसे देख उनकी आँखें भर आईं।
शाम होते ही सब तैयार होकर हॉल की ओर निकल पड़े। मेहमानों से हॉल भर गया, सबकी बधाइयाँ स्वीकार करते हुए रुचि-विनोद ने एक-दूसरे को माला पहनाई, केक काटा।
सुनीता भी अपने पति और दोनों बेटों के साथ पार्टी में आई थी। इतनी भव्य तैयारी देखकर उसके मन में जलन उठी — आज एहसास हो रहा था कि देवर की बेटियाँ होकर भी जो सुख ये लड़कियाँ अपने माँ-बाप को दे रही थीं, वो सुख उसके लाड़ले बेटों ने कभी नहीं दिया, और शायद कभी देंगे भी नहीं।
तभी प्रीति ने माइक लेकर घोषणा की, "नमस्कार सभी को, आप सबका बहुत-बहुत शुक्रिया हमारे बुलाने पर आने के लिए। अब समय है मेरे पापा-माँ के उस गिफ्ट का, जो हम तीनों बहनों ने उन्हें दिया है — इसके लिए सब लॉन की तरफ़ चलिए।"
"ये क्या है प्रीति?" विनोद ने धीरे से पूछा। मानवी हँसते हुए बोली, "आप बस चलिए पापा, खुद देख लीजिए।" तीनों बहनें आँखों-आँखों में इशारे कर हँस रही थीं।
सारे मेहमान कौतूहल से बाहर निकले — लॉन में एक चमचमाती नई कार खड़ी थी। तालियों की गूंज उठी, "वाह भई वाह, बेटियाँ हों तो ऐसी!"
"पापा, अब आपके स्कूटर का मज़ा तो ये नहीं दे सकती, पर हम सब एक साथ स्कूटर पर तो बैठ भी नहीं सकते — इसलिए आज से इसी की सवारी होगी," अंकिता की बात पर सब मेहमान हँस पड़े।
रुचि और विनोद की आँखों में खुशी के आँसू थे, सिर गर्व से ऊँचा। खूब बधाइयाँ मिलीं, पार्टी का खूब लुत्फ़ उठाया गया।
सुनीता भी बधाई देने पहुँची, "बधाई हो देवर जी, बेटियों ने नई गाड़ी दी, अब और क्या चाहिए।"
"सच कहा भाभी, और क्या चाहिए मुझे जब ऐसे बच्चे हों। मैंने कहा था न, बेटियाँ खुद अपना भाग्य बनाती हैं — यहाँ तो इन तीनों ने मेरा भाग्य भी बदल दिया। देखिए तो, कैसे स्कूटर से उठाकर मुझे कार में बिठा दिया।"
देवर की बात सुनकर सुनीता ने अपने बेरोज़गार, लापरवाह जवान बेटों की तरफ़ देखा, जो आइसक्रीम के मज़े लेने में मशगूल थे — आज बेटों की माँ होने का उसका घमंड चकनाचूर हो चुका था।
बेटियाँ किसी बेटे से कम नहीं होतीं — बस थोड़ा प्यार और साथ मिले, तो बेटियाँ वो कर जाती हैं जो कई बेटे वालों की किस्मत में भी नहीं होता।


