विरासत का मोल
राकेश जैसे ही घर पहुँचा, बेटे ने दौड़कर बताया कि पड़ोस वाले गुप्ता अंकल नई आर्टिगा ले आए हैं। पत्नी सुनीता चाय का कप थमाते हुए बोली, "पूरे सत्रह लाख की गाड़ी, वो भी कैश में! और तुम हो कि बाइक से दफ्तर जाते हो।" राकेश बस "हूँ...हाँ" करता रहा।
आखिर सुनीता का सब्र टूट गया, "हम भी एक गाड़ी ले सकते हैं। सबके सामने बाइक से पहुँचना कितना अजीब लगता है, तुम्हें भले न लगे, मुझे तो लगता है।"
राकेश धीरे से बोला, "घर की किश्त, बच्चों की पढ़ाई के बाद बचता ही कितना है गाड़ी के लिए। आगे भी बहुत खर्चे हैं।"
"बाकी लोग भी तो कमाते हैं! तुमसे कम तनख्वाह वालों के पास भी स्कॉर्पियो है। तुम्हारा पैसा जाता कहाँ है?" सुनीता गुस्से में बोली।
"अरे भई, सारा पैसा तो तुम्हारे ही हाथ में देता हूँ, तुम्हीं जानो कहाँ खर्च होता है," राकेश ने जवाब दिया।
"मुझे कुछ नहीं पता, तुम गाँव की जमीन बेच दो। यही सही वक्त है घूमने-फिरने का, जिंदगी जीने का। मरने के बाद क्या ले जाओगे ज़मीन? कल ही गाँव जाकर बात पक्की कर आओ," सुनीता ने फैसला सुना दिया।
"ठीक है, पर तुम भी साथ चलोगी," राकेश ने कहा। सुनीता खुशी-खुशी मान गई, और शाम तक पूरे मोहल्ले में खबर फैल गई कि सुनीता जल्द गाड़ी लेने वाली है।
अगली सुबह दोनों गाँव पहुँचे। बच्चे चाचा को देखकर दौड़ पड़े, "चाचा, माँ आ रही है, खेत पर ही रुक जाओ!" भाभी लोटे में पानी लेकर आईं, दोनों के पैर धुलवाए और अंदर ले गईं।
बरसों बाद गाँव आए थे वो। कच्चा घर एक तरफ से गिरा हुआ था, छप्पर के नीचे दो गायें बंधी थीं, बच्चों ने छोटी-सी फुलवारी और सब्ज़ी की क्यारी बना रखी थी। सुनीता को उस मिट्टी की खुशबू ने जैसे मोह लिया। भाभी ने अंदर बुलाया, पर वो वहीं खटिया पर बैठ गई।
राकेश के बड़े भाई गाँव में कथा सुनाया करते थे। एक बच्चा भागकर उन्हें बुलाने गया और कान में कुछ कहा। यह सुनते ही उनकी आँखों से आँसू बह निकले, गला भर आया। श्रोताओं से माफी माँगते हुए बोले, "आज भरत वन से लौट आया है राम की नगरी।" लोग समझ नहीं पाए कि पंडित जी आज उल्टी बात क्यों कह रहे हैं। वो झोला उठाकर घर की ओर चल दिए।
राकेश ने भाई को देखते ही दौड़ लगाई, पंडित जी के हाथ से झोला छूट गया, दोनों भाई गले लग गए। दो भाइयों को यूँ रोते देखकर सुनीता की आँखें भी नम हो गईं। वो उठी, जेठ के पैर छुए, और उनके आशीर्वाद भरे शब्दों को सुनकर भीतर तक भर गई।
शहर के दो कमरों में रहने की आदी आँखें अब सामने की हरियाली, नीम-आम-पीपल की सरसराहट में खो-सी गईं। पर बार-बार आर्टिगा की तस्वीर उस सम्मोहन को तोड़ जाती। वो खेतों को देखती और मन ही मन उनकी कीमत आँकने लगती।
दोपहर के भोजन के बाद पंडित जी रोज़ की तरह रामायण पढ़कर सुनाने लगे। आज दो नए श्रोता जुड़े थे — अयोध्याकांड चल रहा था, मंथरा कैकेयी को उकसा रही थी। सुनीता को सुनते हुए एक अजीब बेचैनी होने लगी, जैसे उसकी चोरी पकड़ी जा रही हो।
पाठ खत्म होने पर पंडित जी गाँव की बातें सुनाने लगे। सुनीता को इसमें रस आने लगा। उसने पूछा, "क्या सारे खेतों में फसल होती है?" पंडित जी बोले, "एक हिस्सा परती पड़ा है।" सुनीता को मौका मिल गया, "फिर उसे बेचकर कच्चे घर को पक्का क्यों नहीं करवा लेते?"
पंडित जी चौंक गए। बोले, "बहू, ये दूसरी गाय देख रही हो, दूध नहीं देती, फिर भी सेवा करते हैं, कसाई को नहीं देते। ये जो परती खेत है, इसमें हमारे पुरखों का पसीना लगा है। ये विरासत है, विरासत बेची नहीं जाती। इसे सहेजते-सहेजते कई पीढ़ियाँ खप गईं। जिन्होंने ज़मीन बेच दी, उनकी पीढ़ियाँ आज मनरेगा में मज़दूरी कर रही हैं या शहर की भीड़ में कहीं गुम हो गईं। तुम इन खेतों की रानी हो, इनकी सेवा करो तो मिट्टी सोना उगलती है। शहर वाला लालच सब कुछ छीन लेता है — रिश्ते, प्रेम, ज़मीन, पानी, हवा, सब। तुम लोग आज आए तो लगा मेरा गाँव शहर को हरा कर आ गया। शहर को जीतने मत देना बेटा, वो आदमी को मशीन बना देता है। हम तो राम को मानने वाले हैं, जो सोने की लंका जीतकर भी अपनी माटी अयोध्या को स्वर्ग से बड़ा मानते हैं।"
तभी भाभी अंदर से आईं और उसे भीतर ले गईं। कच्चे घर की ठंडी मिट्टी की खुशबू सुनीता को भा रही थी। भाभी ने एक पोटली उसके सामने रखी, "लल्ला ने बता दिया था मुझे। ये रख लो, अगर इससे गाड़ी आ जाए तो ठीक, नहीं तो कहेंगे इनसे कि खेत बेच दें।"
सुनीता मुस्कुराई और रो पड़ी, "विरासत कभी बेची नहीं जाती भाभी। मैं बड़ों की संगत से दूर रही, इसीलिए इसका मोल न समझ पाई। अब इसी परती खेत से सोना उगाएँगे, फिर गाड़ी लेकर आप दोनों को हरिद्वार ले जाएँगे।" दोनों जिठानी-देवरानी गले लगकर रो पड़ीं। बरसों की गलतफ़हमी धुल गई।
अगले दिन लौटते वक्त सुनीता ने राकेश से कहा, "सुनो, गाड़ी के डाउन-पेमेंट के लिए जो पैसे जोड़े थे, उनसे परती खेत में अच्छी खेती करवाओ। अगली बार उसी फसल से छोटी-सी कार लेंगे और भैया-भाभी को हरिद्वार लेकर चलेंगे।"
शहर हार गया था, और गाँव अपनी विरासत को मिले इस सम्मान पर गर्व से भर उठा।


