तलाक के कागज़
रात को जब मैं घर पहुंचा तो पत्नी ने हमेशा की तरह खाना लगा दिया। मैंने उसका हाथ अपने हाथों में लिया और कहा, "मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।" वह चुपचाप बैठी खाना खा रही थी, पर उसकी आंखों में एक अजीब सी बेचैनी साफ झलक रही थी, जैसे उसे पहले से ही कुछ आभास हो चुका हो।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कैसे शुरू करूं, फिर भी बात तो करनी ही थी। मैंने बड़ी शांति से कह दिया, "मुझे तलाक चाहिए।" लगा जैसे उसे मेरे शब्दों से कोई फर्क नहीं पड़ा — उसने बस इतना पूछा, "क्यों?"
मैं उसके सवाल को टाल गया, और यही बात उसे तोड़ गई। उसने हाथ में पकड़ा चम्मच फेंक दिया और चिल्लाकर बोली, "तुम इंसान नहीं हो!" उस रात हम दोनों ने एक-दूसरे से कोई बात नहीं की। वह रात भर रोती रही।
मुझे अच्छी तरह पता था कि वह जानना चाहती थी आखिर हमारे बीस साल के रिश्ते में ऐसा क्या टूट गया, पर उसके सवालों का जवाब देना मेरे लिए नामुमकिन था। सच यह था कि मैं किसी और से — निशा नाम था उसका — प्यार करने लगा था। अब मुझे अपनी पत्नी से वो पहले वाला जुड़ाव महसूस नहीं होता था। मैंने उसके बरसों के प्यार को इसी तरह की सज़ा दी थी।
भारी मन से मैंने तलाक के कागज़ात तैयार करवाए, जिनमें लिखा था कि वह हमारा घर, मेरी कार और कंपनी में तीस प्रतिशत हिस्सा ले सकती है। लेकिन उसने वे कागज़ात देखे और उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर डाला।
जिस औरत ने मेरे साथ ज़िंदगी के बीस साल बिताए थे, वह आज मेरे लिए अजनबी बन चुकी थी। और उन बीस सालों को, जो उसने पूरी तरह मेरे लिए समर्पित कर दिए थे, मैंने एक झटके में बर्बाद कर दिया था। मगर जो हो चुका था, उसे मैं बदल नहीं सकता था — मैं किसी और से अपनी पत्नी से भी ज़्यादा प्यार करने लगा था।
आखिरकार उसका सब्र टूट गया, और वह मेरे सामने फूट-फूटकर रोने लगी। उसका यूं रो पड़ना मेरे लिए किसी बोझ से मुक्ति जैसा था। जो बात कई दिनों से मुझे परेशान कर रही थी, वह अब आखिरकार खुलकर सामने आ चुकी थी।
अगले दिन मैं काफी देर से घर लौटा। मैंने देखा वह टेबल पर बैठी कुछ लिख रही थी। मैंने शाम का खाना भी नहीं खाया था, फिर भी सीधा अपने कमरे में जाकर सो गया — पूरे दिन निशा के साथ रहने और ढेर सारे कामों ने मुझे थका दिया था।
शायद वह रात भर उसी टेबल पर लिखते-लिखते सो गई थी। सुबह उसने मुझे तलाक की अपनी शर्तें बताईं। वह मुझसे कुछ भी नहीं चाहती थी। बस, तलाक से पहले उसे एक महीने का समय चाहिए था। उसका कहना था कि अगले महीने हमारे बेटे की परीक्षा है, इसलिए वह चाहती थी कि हम दोनों उस एक महीने जितना संभव हो, पहले जैसा जीवन जिएं, ताकि हमारे टूटते रिश्ते का असर उसकी पढ़ाई पर न पड़े।
मुझे यह बात ठीक लगी। पर उसने एक और शर्त रखी — जैसे शादी के दिन मैं उसे गोद में उठाकर विवाह-कक्ष तक ले गया था, वैसे ही हर दिन, एक महीने तक, मुझे उसे बेडरूम से घर के मुख्य दरवाज़े तक गोद में उठाकर ले जाना होगा। मुझे यह बात कुछ अजीब सी लगी, पर इन आखिरी दिनों को थोड़ा बेहतर बनाने के लिए मैंने उसकी यह शर्त मान ली।
मैंने निशा को अपनी पत्नी की सारी शर्तें बताईं। वह हंस पड़ी, उसे लगा चाहे मेरी पत्नी कैसे भी अजीब तरीके अपनाए, तलाक तो होकर ही रहेगा।
उस पूरे महीने हम दोनों किसी से नहीं मिले। पहले दिन जब मैंने उसे पहली बार उठाकर मुख्य द्वार तक ले जाया, हम दोनों थोड़े असहज महसूस कर रहे थे। पीछे से हमारा बेटा खिलखिलाकर तालियां बजा रहा था।
अगले दिन यह काम कुछ सहज हो गया। वह मेरे सीने से लगी थी, और मैं उसकी खुशबू महसूस कर पा रहा था। ऐसा लगा जैसे बरसों बाद मुझे यह खुशबू आई हो, या शायद बरसों से मैंने उसके होने को महसूस ही नहीं किया था।
वह अब पहले जितनी युवा नहीं रही थी। चेहरे पर हल्की झुर्रियां थीं, बाल भी थोड़े सफेद होने लगे थे। यह वही औरत थी जिसने अपनी ज़िंदगी के बीस साल मुझे सौंप दिए थे। एक पल के लिए मैंने सोचा — मैंने उसका क्या हाल कर दिया था।
चौथे दिन जब मैंने उसे उठाया तो कुछ पुरानी अंतरंगता लौटने लगी। पांचवें और छठे दिन वह पुराना प्यार धीरे-धीरे जागने लगा। मैंने निशा को इस बारे में कुछ नहीं बताया। अब उसे उठाना आसान होता जा रहा था, शायद रोज़ाना इस अभ्यास से मैं ज़्यादा मज़बूत हो रहा था।
एक दिन वह अपनी पसंद के कपड़े ढूंढ रही थी, पर कुछ खास मिल नहीं रहा था। उसने सांस लेते हुए कहा, "मेरे सारे कपड़े अब बड़े लगने लगे हैं।" तभी मुझे अहसास हुआ कि वह काफी दुबली हो गई है, और इसीलिए मैं उसे आसानी से उठा पा रहा था।
मेरे दिल को एक झटका सा लगा। उसने अपने भीतर बहुत सारा दर्द छुपा रखा था। पता नहीं कैसे, मैं आगे बढ़ा और उसके सिर को हल्के से छुआ।
हमारा बेटा दौड़ता हुआ आया और बोला, "पापा, मम्मा को गोद में उठाकर बाहर ले जाने का टाइम हो गया है!" उसके लिए अपने पापा का मम्मा को इस तरह उठाकर ले जाना अब रोज़ की ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्सा बन चुका था।
मेरी पत्नी ने हमारे बेटे को बुलाया और उसे कसकर गले लगा लिया। मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया, डर था कहीं मेरा फैसला न बदल जाए।
मैंने रोज़ की तरह उसे उठाया और बेडरूम से बैठक होते हुए दरवाज़े तक लाया। उसने प्यार से अपने दोनों हाथ मेरी गर्दन के इर्द-गिर्द रख दिए। मैंने उसे कसकर थाम रखा था, बिल्कुल हमारी शादी वाले दिन की तरह।
पर उसका इतना कम वज़न मुझे परेशान कर रहा था। महीने के आखिरी दिन जब मैंने उसे उठाया, तो एक कदम चलना भी मुश्किल हो गया। बेटा स्कूल जा चुका था। मैंने खुद से कहा — हमारी ज़िंदगी से प्यार आखिर कहां खो गया था।
मैं अपनी कार से ऑफिस निकला, पर रास्ते में ही कार से उतर गया, बिना उसे लॉक किए। मुझे डर था एक पल की भी देरी मेरा इरादा बदल सकती है। मैं ऊपर गया, निशा ने दरवाज़ा खोला और मैंने कहा, "सॉरी निशा, अब मुझे अपनी पत्नी से तलाक नहीं लेना।"
उसने चौंककर मुझे देखा और मेरे माथे पर हाथ रखकर पूछा, "तुम्हें बुखार तो नहीं है?" मैंने उसका हाथ हटाया और फिर कहा, "सॉरी निशा, अब मुझे तलाक नहीं चाहिए। शायद हम दोनों की अनदेखी की वजह से हमारी शादीशुदा ज़िंदगी उबाऊ हो गई थी, पर इसका मतलब यह नहीं कि हम एक-दूसरे से प्यार नहीं करते। अब मुझे समझ आया — जिस दिन मैं उसे ब्याहकर अपने घर लाया था, उस दिन से लेकर जीवन के आखिरी दिन तक मुझे उसका साथ निभाना है।"
निशा को जैसे अचानक होश आया। उसने मुझे एक जोरदार थप्पड़ जड़ा और मेरे सामने ही दरवाज़ा बंद करके रोने लगी। मैं सीढ़ियां उतरकर कार में बैठ गया।
रास्ते में एक फूलों की दुकान पर रुका, अपनी पत्नी के लिए एक सुंदर सा गुलदस्ता लिया। सेल्सगर्ल ने पूछा, "इस पर क्या लिखवाना है?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "लिख दो — मैं तुम्हें उम्र भर यूं ही अपनी बांहों में उठाकर चलता रहूंगा।"
उस शाम जब मैं हाथों में गुलदस्ता लिए घर पहुंचा, मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी। मैं सीधे अपने कमरे की तरफ बढ़ा — पर तब तक वह मुझे हमेशा के लिए छोड़कर जा चुकी थी। वह कई महीनों से कैंसर से लड़ रही थी, लेकिन मैं निशा के साथ इतना खोया रहा कि कभी ध्यान ही नहीं दिया।
उसे पता था वह जल्द ही मुझसे बिछड़ने वाली है, और वह सिर्फ यह चाहती थी कि मेरे और हमारे बेटे के रिश्ते में कोई दरार न आए। भले ही मैं उससे तलाक चाहता था, फिर भी उसने अपने आखिरी दिनों में मुझे अपने बच्चे की नज़रों में एक प्यार करने वाला पति और पिता बना दिया था।
ज़िंदगी की छोटी-छोटी बातें रिश्तों में बहुत मायने रखती हैं। बड़ा घर, बड़ी गाड़ी, बैंक बैलेंस — ये सब खुशियों का हिस्सा तो बन सकते हैं, पर अपनों के बिना इनकी कोई कीमत नहीं। इसलिए अपने प्रियजनों, अपनी पत्नी और बच्चों के लिए वक्त निकालिए, और हर वो काम कीजिए जो आपको एक-दूसरे के करीब लाए, प्यार बढ़ाए — तभी आप एक सच्ची, खुशहाल ज़िंदगी जी सकते हैं।
अगर यह कहानी आपको छू गई हो तो इसे शेयर ज़रूर करें — शायद आपका यह एक कदम किसी के टूटते घर और बिखरते रिश्ते को बचा ले।


