टीचर की टिफिन कहानी
"सुनिए जी, ज़रा विनय की कंपनी में जाकर टिफिन दे आइएगा?"
"क्यों, आज विनय टिफिन लेकर नहीं गया क्या?" गोपाल राव ने अखबार से नज़रें उठाते हुए पूछा।
"आज उसकी कंपनी में चेयरमैन साहब आ रहे हैं, इसलिए वह सुबह सात बजे ही निकल गया, इतनी जल्दी खाना बन ही नहीं पाया था।"
"अच्छा, ठीक है, मैं दे आता हूं।"
गोपाल राव ने अखबार एक तरफ रखा और कपड़े बदलने कमरे में चले गए। सुनयना ने राहत की सांस ली — गोपाल राव तैयार होने चले गए, यानी उन्होंने विनय और उसके बीच हुई तीखी बहस नहीं सुनी थी।
बहस भी क्या, वही पुरानी कहानी — विनय का हमेशा अपने पिता पर आरोप लगाना, और सुनयना का हर बार अपने पति का पक्ष लेना। मुद्दा भी वही घिसा-पिटा — "हमारे पापा ने आखिर हमारे लिए किया ही क्या है?"
"मां, मेरे दोस्त के पापा भी टीचर थे, देखो उन्होंने कितना बड़ा बंगला बनवा लिया। और यहां हम आज भी किराए के मकान में रह रहे हैं!"
"विनय, तुझे पता है ना, तेरे पापा घर में सबसे बड़े थे। दो बहनों और दो भाइयों की शादी का पूरा खर्च उन्होंने ही उठाया। तेरी बहन की शादी का खर्च भी उन्हीं का था। गांव की ज़मीन का कोर्ट-कचहरी का मामला भी वे ही निपटाते रहे। ये सारी ज़िम्मेदारियां किसने संभालीं?"
"पर उसका फायदा क्या हुआ? उनके भाई-बहन आज बंगलों में रह रहे हैं। कभी किसी ने सोचा कि जिस भाई ने हमारे लिए इतना कष्ट उठाया, उसके लिए एक छोटा सा घर बना दें? हम ही क्यों न बना दें उन्हें एक घर?"
एक पल के लिए सुनयना की आंखें भर आईं। अपने ही जन्मे बेटे को कैसे समझाएं कि "पापा ने क्या किया मेरे लिए" पूछना कितना गलत है।
"तुम्हारे पापा ने अपना फ़र्ज़ निभाया, बिना भाई-बहनों से कुछ अपेक्षा रखे," वह बोलीं।
विनय बेतुकी बात करते हुए बोला, "अच्छा, वो तो ठीक है। उन्होंने हज़ारों बच्चों को मुफ्त में ट्यूशन दिया। फीस ले लेते तो आज पैसों में खेल रहे होते। आजकल के क्लास वालों को देखो, इंपोर्टेड गाड़ियों में घूमते हैं।"
"सच कह रहे हो तुम, पर तुम्हारे पापा का सिद्धांत यही था — ज्ञान बांटना, उसका पैसा नहीं लेना। इसी सिद्धांत की वजह से उन्हें कितनी इज़्ज़त मिली, कितने सम्मान मिले, उसका अंदाज़ा है तुम्हें?"
यह सुनते ही विनय भड़क गया, "क्या चाटना है उन सम्मानों को? इनसे घर थोड़े बन जाता है, पड़े रहते हैं धूल खाते हुए, कोई पूछता तक नहीं उनको।"
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। विनय ने दरवाज़ा खोला तो गोपाल राव खड़े थे। पापा ने सुन तो नहीं लिया, यह सोचकर विनय का चेहरा उतर गया। पर गोपाल राव बिना कुछ बोले भीतर चले गए, और वह विवाद वहीं थम गया।
यह थी सुनयना और विनय की कल की बहस — पर आज...
गोपाल राव ने टिफिन साइकिल के कैरियर पर टांगा और तपती धूप में औद्योगिक क्षेत्र की ओर, बेटे की कंपनी की तरफ निकल पड़े। सात किलोमीटर दूर, कंपनी तक पहुंचते-पहुंचते उनकी सांस फूल गई थी। गेट पर सिक्योरिटी गार्ड ने उन्हें रोक लिया।
"विनय सर के लिए टिफिन देना है, अंदर जाऊं क्या?"
"अभी नहीं साहब, सर अभी नहीं आए हैं," गार्ड बोला, "चेयरमैन साहब आए हुए हैं, मीटिंग चल रही है। किसी भी वक्त खत्म हो सकती है। आप बाजू में ही रुक जाइए, चेयरमैन साहब के सामने आप दिखने नहीं चाहिए।"
गोपाल राव थोड़ी दूर, तेज़ धूप में ही खड़े रह गए। आसपास कहीं भी छांव नहीं थी। बातों-बातों में एक घंटा बीत गया, पैरों में दर्द होने लगा। वे पास की एक तपती हुई चट्टान पर बैठने ही वाले थे कि गेट खुलने की आवाज़ आई — शायद मीटिंग खत्म हो गई थी।
चेयरमैन साहब के पीछे कई अधिकारी और उनके साथ विनय भी बाहर आया। उसने अपने पिता को वहां खड़े देखा तो मन ही मन झुंझला गया। चेयरमैन साहब गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर बैठने ही वाले थे कि उनकी नज़र गोपाल राव पर पड़ी। वे गाड़ी में बैठने के बजाय वहीं रुक गए।
"वो सामने कौन खड़ा है?" उन्होंने गार्ड से पूछा।
"विनय सर के पिताजी हैं, उनके लिए खाना लेकर आए हैं," गार्ड ने घबराते हुए कहा।
"बुलाइए उन्हें।"
जो नहीं होना था, वही हुआ। विनय के माथे पर पसीना छलक आया, गुस्सा और डर मिलकर उसका दिमाग सुन्न कर रहे थे। गार्ड के बुलाने पर गोपाल राव पास आए। चेयरमैन साहब आगे बढ़े।
"आप पाटील सर हैं ना? डी.एन. हाई स्कूल में पढ़ाते थे?"
"हां, पर आप मुझे कैसे पहचानते हैं?"
गोपाल राव कुछ समझ पाते, इससे पहले ही चेयरमैन साहब ने झुककर उनके चरण छू लिए। सभी अधिकारी और विनय यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए।
"सर, मैं आदित्य अग्रवाल — आपका छात्र। आप मुझे घर पर पढ़ाने आते थे।"
"हां...हां...याद आया! अरे वाह, बहुत बड़े आदमी बन गए आप तो!" गोपाल राव हंस पड़े।
"सर, आप यहां धूप में क्यों खड़े हैं? अंदर चलिए, बहुत बातें करनी हैं। सिक्योरिटी, तुमने इन्हें अंदर क्यों नहीं बिठाया?"
गार्ड शर्म से सिर झुका बैठा। यह देखकर गोपाल राव खुद बोल पड़े, "इसकी कोई गलती नहीं, आपकी मीटिंग चल रही थी, आपको परेशानी न हो इसलिए मैं ही बाहर रुक गया।"
चेयरमैन ने गोपाल राव का हाथ थामा और उन्हें अपने आलीशान केबिन में ले गए। "बैठिए सर," अपनी कुर्सी की ओर इशारा करते हुए बोले।
"नहीं-नहीं, वो कुर्सी तो आपकी है," गोपाल राव संकोच से बोले।
"सर, आपकी वजह से ही मुझे यह कुर्सी मिली है, तो पहला हक आपका है।" चेयरमैन ने ज़बरदस्ती उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाया।
फिर जनरल मैनेजर की तरफ देखते हुए बोले, "आपको पता नहीं होगा — पाटील सर न होते, तो आज यह कंपनी न होती, और मैं अपने पिता की अनाज की दुकान ही संभाल रहा होता।"
विनय और जी.एम. दोनों हैरानी से उन्हें देखते रह गए।
"स्कूल के दिनों में मैं बेहद कमज़ोर विद्यार्थी था। जैसे-तैसे नौवीं तक पहुंचाया गया। शहर की सबसे अच्छी क्लास में एडमिशन दिलाया गया, पर मन पढ़ाई में कभी नहीं लगा। ऊपर से अमीर बाप का बेटा — दिनभर स्कूल में मस्ती-मारपीट, शाम की क्लास बंक करके फिल्में देखना, यही मेरा शगल था। मां को यह बर्दाश्त नहीं होता था। उस वक्त पाटील सर कड़े अनुशासन और उम्दा शिक्षण के लिए मशहूर थे। मां ने उनसे मुझे पढ़ाने की विनती की, पर उनके छोटे से घर में बैठने की जगह ही नहीं थी, इसलिए सर ने असमर्थता जताई। मां ने बहुत विनती की, मुंह-मांगी फीस देने की बात कही। सर ने फीस लेने से साफ इनकार कर दिया, पर बार-बार अनुरोध पर घर आकर पढ़ाने को राज़ी हो गए।
पहले दिन सर आए, मैं हमेशा की तरह शरारत करने लगा। सर ने मेरी अच्छी खासी पिटाई कर दी। उस पिटाई का ऐसा असर हुआ कि मैं चुपचाप बैठने लगा। यकीन मानिए, पहले ही हफ्ते में मुझमें पढ़ने की रुचि जाग गई। फिर तो पढ़ाई के अलावा कुछ सूझता ही नहीं था। सर इतना अच्छा पढ़ाते थे कि जो अंग्रेज़ी, गणित, विज्ञान पहले मुझे कठिन लगते थे, वे अब आसान लगने लगे। सर जिस दिन न आते, मैं बेचैन हो जाता। नौवीं में मैं दूसरे नंबर पर आया। मां-पापा बेहद खुश हुए। मैं तो जैसे हवा में उड़ने लगा था। दसवीं में मैंने बाकी सारी क्लासें छोड़ दीं और सिर्फ पाटील सर से पढ़ना शुरू किया — और मेरिट में आकर सबको चौंका दिया।"
"माय गुडनेस! पर सर, फिर भी आपने फीस नहीं ली उनसे?" जनरल मैनेजर ने पूछा।
"मां-पापा के साथ मैं मिठाई लेकर सर के घर गया था। पापा ने उन्हें एक लाख रुपये का चेक दिया, सर ने नहीं लिया। उस दिन सर ने जो कहा, वह मुझे आज भी याद है — 'मैंने कुछ नहीं किया, आपका बेटा ही होशियार है, मैंने सिर्फ उसे रास्ता दिखाया। मैं ज्ञान बेचता नहीं, दान करता हूं।'
बाद में सर के मार्गदर्शन में मैंने बारहवीं में भी मेरिट हासिल की। इंजीनियरिंग के बाद अमेरिका जाकर मास्टर्स किया, और अपने ही शहर में यह कंपनी शुरू की। एक साधारण पत्थर को तराशकर सर ने हीरा बना दिया था — और मैं अकेला नहीं, ऐसे न जाने कितने हीरे उन्होंने तराशे हैं। सर, आपको कोटि-कोटि प्रणाम।"
चेयरमैन साहब ने अपनी आंखों में आए आंसू रूमाल से पोंछे।
"पर सर, यह सचमुच अद्भुत है — बाहर पढ़ाई और ज्ञान का इतना बड़ा बाज़ार होते हुए भी आपने एक रुपया लिए बिना हज़ारों बच्चों को पढ़ाया, और सिर्फ पढ़ाया ही नहीं, उनमें पढ़ने का जुनून भी भर दिया। वाह सर, आपको और आपके सिद्धांतों को सलाम," जी.एम. ने कहा।
"अरे साहब, यह इंसान सिद्धांतों का पक्का है। पैसे और नाम की भूख इसे छू भी नहीं गई। विद्यार्थी का भला हो, बस यही एक मकसद था इनका," चेयरमैन बोले, फिर धीमे स्वर में जोड़ा, "मेरे पिताजी भी उन्हीं में से एक थे — भूखे रह लेंगे, पर अनाज में मिलावट करके नहीं बेचेंगे। यही उनका सिद्धांत था, ज़िंदगी भर उसी पर चले। आज उसी ईमानदारी का फायदा मेरे भाइयों को मिल रहा है।"
काफी देर तक कोई कुछ नहीं बोला। फिर चेयरमैन ने पूछा, "सर, आपने घर बदला या अभी भी उसी मकान में हैं?"
"अभी भी उसी पुराने मकान में हैं सर," गोपाल राव की जगह विनय ने ही जवाब दिया।
उस जवाब में छिपी पिता के प्रति नाराज़गी चेयरमैन साहब ने तुरंत भांप ली।
"तय हुआ फिर। सर, आज मैं आपको गुरु दक्षिणा दे रहा हूं। इसी शहर में मेरे कुछ फ्लैट्स हैं, उनमें से एक थ्री बीएचके फ्लैट मैं आपके नाम कर रहा हूं..."
"क्या?!" गोपाल राव और विनय दोनों चौंक गए। "नहीं-नहीं, इतनी बड़ी दक्षिणा नहीं चाहिए मुझे," गोपाल राव ने आग्रहपूर्वक मना किया।
चेयरमैन ने उनका हाथ थामा, "सर प्लीज़, मना मत कीजिए, और मुझे माफ करें — काम की व्यस्तता में आपकी गुरु दक्षिणा देने में पहले ही बहुत देर हो चुकी है।"
फिर विनय की ओर देखते हुए पूछा, "विनय, तुम्हारी शादी हो गई क्या?"
"नहीं सर, बात पक्की हुई है, पर जब तक अच्छा घर नहीं मिलता तब तक ससुरजी शादी की तारीख नहीं तय करने देंगे — यही शर्त रखी है उन्होंने। इसीलिए अभी तक हॉल भी बुक नहीं हुआ।"
चेयरमैन ने फौरन फोन उठाया, किसी से बात की, और संतुष्ट भाव से फोन रखकर बोले, "अब कोई चिंता नहीं। तुम्हारे मैरिज गार्डन की व्यवस्था हो गई — 'सागर लॉन्स' का नाम सुना होगा?"
"सर, वो तो बहुत महंगा है..."
"अरे, तुझे पैसे कहां देने हैं! सर के सारे विद्यार्थी सर के लिए कुछ भी कर सकते हैं, बस एक इशारे की देर है। पर सर सिद्धांतों के पक्के हैं, ऐसा करेंगे नहीं। उस लॉन्स का मालिक भी सर का ही शिष्य है, मैंने सिर्फ बताया — उसने खुद खुशी से पूरी शादी का, हॉल से लेकर खाने तक का, सारा खर्च उठाने की ज़िम्मेदारी ले ली है। तुम बस तारीख बताओ और सामान लेकर जाओ।"
"बहुत-बहुत शुक्रिया सर!" विनय हाथ जोड़कर खुशी से बोला।
"शुक्रिया मुझे नहीं, अपने पिताजी को कहो, यह उन्हीं का पुण्य है। और मुझे एक वचन दो, विनय — सर की आखिरी सांस तक तुम उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ोगे, उन्हें कोई तकलीफ नहीं होने दोगे। अगर मुझे कभी पता चला कि तुमने उन्हें दुख दिया है, तो न सिर्फ इस कंपनी से बाहर कर दूंगा, बल्कि पूरे महाराष्ट्र में कहीं भी नौकरी लायक नहीं छोड़ूंगा।" चेयरमैन साहब का स्वर सख्त हो गया।
"नहीं सर, मैं वचन देता हूं, ऐसा कभी नहीं होगा," विनय हाथ जोड़े हुए बोला।
शाम को जब विनय घर लौटा, गोपाल राव किताब पढ़ रहे थे और सुनयना पास बैठी सब्ज़ी काट रही थीं। विनय ने बैग एक तरफ रखा और गोपाल राव के पैर पकड़कर बोला, "पापा, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं आपको आज तक गलत समझता रहा। मुझे पता ही नहीं था पापा, आप इतने महान इंसान हो।"
गोपाल राव ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया। अपना बेटा क्यों रो रहा है, सुनयना को कुछ समझ नहीं आया, पर इतना ज़रूर महसूस हुआ कि कुछ अच्छा हुआ है — बाप-बेटे के बीच जो प्यार उमड़ रहा था, उसे देखकर उनकी आंखों से भी कुछ बूंदें गालों पर लुढ़क आईं।
अपने पिता से कभी यह मत पूछिए कि "आपने मेरे लिए किया ही क्या है?" — जो भी अर्जित करना है, खुद मेहनत से करिए। उन्होंने जो शिक्षा और संस्कार दिए हैं, वही जीवन भर आपका सबसे बड़ा मार्गदर्शक बनेंगे।


