कालू की वफा
बारिश के मौसम में शहर के एक फ्लाईओवर के नीचे रामू नाम का एक अपंग भिखारी रहता था। उसका एक पैर नहीं था, और वह सड़क किनारे बैठकर लोगों से मदद मांगकर अपना गुज़ारा करता था। उसके साथ हमेशा एक भूरे रंग का आवारा कुत्ता रहता था, जिसे उसने प्यार से "मोती" नाम दिया था।
एक दिन शहर में राहत शिविर लगा, जहां ज़रूरतमंदों को मुफ्त खाना बांटा जा रहा था। स्वयंसेवकों में से एक युवक, अरुण, वहां ड्यूटी पर था। उसने देखा कि मोती हर बार लाइन में आता, किसी न किसी के हाथ से खाने का पैकेट झपट कर भाग जाता।
अरुण को गुस्सा आया। उसने सोचा कि यह कुत्ता किसी दिन किसी को काट लेगा। एक दिन जब मोती फिर से खाना छीनकर भागा, अरुण डंडा लेकर उसके पीछे दौड़ा। मोती एक पुराने पुल के नीचे बनी झोंपड़ी में घुस गया।
अरुण भी वहां पहुंचा। अंदर उसने देखा — रामू लेटा हुआ था, कमज़ोर शरीर, बिखरे बाल, और चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी। मोती ने खाने का पैकेट उसके पास रख दिया था।
अरुण ने गुस्से में पूछा, "यह कुत्ता तुम्हारा है? रोज़ खाना छीनकर भागता है।"
रामू धीरे से बोला, "यह कुत्ता नहीं, मेरा बेटा है साहब। जब से मेरी टांग गई और घरवालों ने साथ छोड़ा, यही मेरे साथ है। मैं इसे मना नहीं कर पाता। मेरी भाषा नहीं समझता, पर मेरी भूख ज़रूर समझता है।"
रामू ने खाने का पैकेट खोला। पहले उसने मोती के लिए हिस्सा निकाला, फिर खुद खाना शुरू किया। मोती चुपचाप बैठा तब तक इंतज़ार करता रहा जब तक रामू ने पहला निवाला नहीं खाया।
अरुण का हाथ से डंडा गिर पड़ा। वह वहीं खड़ा देखता रह गया। उसे याद आया कि पिछले महीने ही उसके अपने पड़ोस में एक बुज़ुर्ग को उनके बेटों ने वृद्धाश्रम छोड़ आया था।
अरुण चुपचाप बाहर निकल आया। उस दिन के बाद वह हर रोज़ खुद रामू और मोती के लिए खाना लेकर आने लगा — इस बार डंडे के साथ नहीं, बल्कि सम्मान के साथ।
सीख: सच्चा प्रेम और वफादारी शब्दों की मोहताज नहीं होती। कई बार एक बेज़ुबान जानवर वह रिश्ता निभा देता है, जो इंसान अपनों से भी नहीं निभा पाते।

