एक विद्वान की परीक्षा
महसूस करें - मैं कृतज्ञ हूँ, जीवन की हर सीख के लिए प्रसिद्ध संस्कृत कवि कालिदास भारत में सबसे श्रेष्ठ महान विद्वानों में एक माने जाते हैं। प्राचीन शास्त्रों और भारतीय पौराणिक कथाओं पर आधारित उनकी अनुकरणीय काव्य कृतियों को पवित्र ग्रंथों के समान ही माना जाता है।
परंतु उनके निजी जीवन की गाथाएं भी कम मनोहर या प्रेरक नहीं हैं। अपने समय के सबसे विद्वान दार्शनिक के रूप में प्रसिद्ध, उन्हें चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में नौवें रत्न के रूप में सम्मानित किया गया था। ऐसा भी कहा जाता था कि उन्हें कई अलौकिक अनुभव भी हुए थे।
अगली पंक्तियों में एक महिला के साथ हुई उनकी वार्ता का वर्णन है, जो हमें निश्चित रूप से स्वयं के बारे में अपनी धारणाओं पर पुनर्विचार व प्रश्न करने के लिए विवश कर देगा...
एक बार कालिदास एक विशाल जंगल से गुज़र रहे थे। सूरज तेज़ चमक रहा था, और मानो उनकी ऊर्जा की हर बूंद सोख रहा था। सूरज या तपिश से उन्हें खास आपत्ति नहीं थी, क्योंकि इसका वे कुछ कर नहीं सकते थे, परंतु पानी के अभाव ने उन्हें व्याकुल कर रखा था।
उनकी प्यास अब लगभग असहनीय हो गई थी, लेकिन तभी उन्होंने एक महिला को पानी के घड़े के साथ गुज़रते देखा और उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वे शीघ्रता से उसके पास गए और पुकारा : "हे माँ! सूरज मुझ पर विशेष रूप से कठोर है, और यह असहनीय प्यास मेरे गले को कांटे की तरह चुभ रही है। कृपया पानी पिला दीजिए, बड़ा पुण्य होगा।"
स्त्री बोली :- "बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी, किंतु पहले तुम अपना परिचय दें दो।"
कालिदास बातचीत में समय व्यर्थ नहीं करना चाहते थे। उनके मुँह से निकला हर शब्द कंठ को पीड़ा दे रहा था। वृद्धा स्त्री को बुरा ना लगे, इसलिए उन्होंने तुरंत उत्तर दिया : "आप मुझे पथिक मानें, व कृपया पानी पिला दें।"
स्त्री बोली :- "तुम पथिक कैसे हो सकते हो पुत्र, पथिक तो केवल दो ही हैं - सूर्य व चन्द्रमा, जो कभी रुकते नहीं हमेशा चलते रहते हैं। तुम इनमें से कौन हो सत्य बताओ।"
कालिदास इस उत्तर से स्तब्ध रह गए। फिर उन्होंने कहा:- "आप सही कह रही हैं, आप मुझे मेहमान समझ लें व कृपया पानी पिला दें।"
स्त्री बोली :- "तुम मेहमान तो नहीं हो सकते। संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम?"
कालिदास इस गहरे तर्क के आगे खुद को निःशब्द महसूस कर रहें थे। वे बोले:- "ठीक है माँ, मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।"
स्त्री ने कहा :- "फिर असत्य, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है। दूसरे पेड़, जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ?"
कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले:- "फिर तो मैं हठी हूँ।"
स्त्री बोली :- "नहीं पुत्र, हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप?"
अब कालिदास धीरज खो चुके थे और चिल्ला उठे: "मैं मूर्ख हूँ।"
स्त्री मुस्करा कर चिढ़ाते हुए बोलीं :- "काश ये सत्य होता। पर मूर्ख तो दो ही हैं, और तुम उनमें से नहीं हो। पहला वह शासक, जो बिना पर्याप्त योग्यता के, लोगों पर शासन करता है। दूसरी वह प्रजा, जो शासक को खुश रखने के लिए उसकी जी-हुज़ूरी करती है, भले ही राजा ग़लत निर्णय कर रहा हो।"
कालिदास उस महिला की विद्वत्ता से विस्मित हो उठे। एक मामूली ज्ञात होने वाली वृद्धा ने उन्हें शब्दों में परास्त कर दिया था! वे, जो कि स्वयं विश्व के सबसे महान संस्कृत कवि माने जाते थे, इस सम्भवतः अनपढ़ महिला के आगे निर्वाक रह गए थे।
वे अपनी पराजय स्वीकार करते हुए, वृद्धा के पैरों में गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे : "हे माँ, मैं बड़ा अज्ञानी था जो ये समझ बैठा कि मैं स्वयं को पहचानता हूँ। आपसे हुई वार्ता ने मेरा दृष्टिकोण बदल दिया है, और मैं बहुत लज्जित हूँ। कृपया इस नादानी के लिए मुझे क्षमा करें, और अब मुझे पानी पिला दें माँ।"
कालिदास ने जब ऊपर देखा तो उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ, वृद्धा की जगह साक्षात् माँ सरस्वती वहाँ खड़ी थीं। माँ का ऐसा सुन्दर उज्ज्वल स्वरूप - उन्हें लगा कहीं ये सब स्वप्न तो नहीं!
फिर माँ मुस्कुराईं और अपनी स्नेहिल शांतिदायक आवाज़ में बोलीं: "हे कालिदास! उठो वत्स। तुम अवश्य ही एक महान विद्वान हो, और तुम्हारे शब्दों में वो ऊर्जात्मक शक्ति है जो पढ़ने वाले के जीवन का रूपांतरण कर सकती है... परंतु अपनी क्षमता पर तुम्हारा अहंकार इन सभी उपलब्धियों का मूल्य घटा देता है। तुम शिक्षित अवश्य हो, लेकिन तुमने अहंकार को भी अपने मन में घर करने दिया है। अतः मुझे स्वयं ही तुम्हारा मार्गदर्शन करने आना पड़ा।
एक सच्चे विद्वान की पहचान उसका ज्ञान नहीं, बल्कि उसकी विनम्रता होती है। यदि आपकी शिक्षा केवल आपके अहं को बढ़ावा देती है, तो वह शिक्षा निरर्थक है। वह जीवन व्यर्थ होगा। तुम जैसे प्रगाढ़ ज्ञानी को यह समझना चाहिए, व दूसरों को भी समझाना चाहिए कि जो भी हमें मिला है, जो हमारी उपलब्धियाँ हैं, वास्तव में वे हमारे गर्व या घमंड करने के लिए हैं ही नहीं। मनुष्य को केवल सीखते रहने की लालसा होनी चाहिए। उसे जीवन भर बस एक शिक्षार्थी (शिष्य) बने रहना चाहिए।"
कालिदास ने तुरंत खड़े होकर हाथ जोड़ अभिवादन किया। उन्होंने अपनी अज्ञानता दूर करने के लिए माँ सरस्वती को धन्यवाद दिया, और अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी। उन्होंने वचन दिया कि ज्ञान के इन मोतियों को वे अनंत काल तक धारण करेंगे।
माँ सरस्वती मुस्कुराईं और अंत में कालिदास को जल का पात्र भेंट किया। उन्होंने कृतज्ञतापूर्वक मटके को स्वीकार किया और अमृत से अधिक मीठे स्वाद वाला पानी पिया! इस मुलाकात ने ना केवल उनकी पानी की प्यास, अपितु ज्ञान की प्यास को भी शांत कर दिया।
इस कहानी का अंत तो यहीं होता है, पर यह कहानी हमारे लिए अंतहीन संदेश छोड़ जाती है। वह यह कि ईश्वर के दिए हमारे अंदर जो भी गुण हैं, वह तब तक निरर्थक हैं जब तक कि वो किसी के लिए सार्थक नहीं हो जाते।
"यदि आप में विनम्रता और सरलता के गुण हैं तो आप यह मान सकते हैं कि आपके पास वह सबकुछ है जो आपको चाहिए।"

